इलाहाबाद हाईकोर्ट : कल्याणकारी योजना के तहत

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इलाहाबाद हाईकोर्ट : कल्याणकारी योजना के तहत
योजना का घर मिलने से नहीं रुकेगा गुज़ारा-भत्ता

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि किसी सरकारी कल्याणकारी योजना के तहत पत्नी को घर मिल जाना उसकी आजीविका का साधन नहीं माना जा सकता। इसलिए वह CrPC की धारा 125 के तहत गुज़ारा-भत्ता मांगने के अधिकार से वंचित नहीं होगी।

जस्टिस गरिमा प्रसाद की बेंच ने यह भी स्पष्ट किया कि पति केवल यह कहकर अपनी कानूनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता कि वह बेरोज़गार है या उसकी आय बहुत कम है।

इन्हीं आधारों पर हाईकोर्ट ने पति की क्रिमिनल रिविज़न याचिका खारिज कर दी। पति ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे अपनी अलग रह रही पत्नी को 5,000 रुपये प्रतिमाह गुज़ारा-भत्ता देने का निर्देश दिया गया था।

पति की दलील

पति का कहना था कि वह अनपढ़ है और ड्राइवर के रूप में काम करता था, जिससे उसे लगभग 5,000 रुपये प्रति माह की आय होती थी। फिलहाल वह बेरोज़गार है।

उसने यह भी दावा किया कि उसकी पत्नी सिलाई-कढ़ाई का काम करके कमाती है और उसे प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत एक घर भी मिला है। पति के अनुसार उसने कभी पत्नी की उपेक्षा नहीं की और समझौते की कोशिश भी की थी। इसलिए उसके मुताबिक फैमिली कोर्ट ने उसकी आर्थिक क्षमता से अधिक गुज़ारा-भत्ता तय किया।

पत्नी का पक्ष

पत्नी ने अदालत को बताया कि दिसंबर 2016 में शादी के बाद उसे दहेज की अतिरिक्त मांग को लेकर क्रूरता और उत्पीड़न का सामना करना पड़ा, जिसके कारण उसे ससुराल छोड़ना पड़ा।

उसने कहा कि पति के पास पर्याप्त साधन होने के बावजूद उसने उसका भरण-पोषण करने से इनकार कर दिया और उसकी उपेक्षा की।

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हाईकोर्ट की टिप्पणी

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद जस्टिस गरिमा प्रसाद ने कहा कि CrPC की धारा 125 एक सामाजिक न्याय संबंधी प्रावधान है, जिसका उद्देश्य महिलाओं को उपेक्षा और परित्याग से बचाना है।

कोर्ट ने चतुर्भुज बनाम सीता बाई (2007) के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि "अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ" होने का अर्थ यह नहीं है कि पत्नी पूरी तरह बेसहारा हो।

साथ ही भुवन मोहन सिंह बनाम मीना (2014) मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि मेंटेनेंस का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पत्नी सम्मानपूर्वक जीवन जी सके और आर्थिक तंगी का सामना न करे।

घर आजीविका का साधन नहीं

हाईकोर्ट ने पति की इस दलील को भी खारिज कर दिया कि पत्नी को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत घर मिलने से वह आत्मनिर्भर हो गई है।

अदालत ने कहा कि केवल दावों या बयानों के आधार पर किसी महिला को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं माना जा सकता। साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि सरकारी आवास योजना के तहत मिला घर आजीविका का साधन नहीं है और इसके आधार पर पत्नी को गुज़ारा-भत्ता से वंचित नहीं किया जा सकता।

बेरोज़गारी नहीं बनेगी बचाव

कोर्ट ने पति की बेरोज़गारी की दलील भी स्वीकार नहीं की। अदालत ने कहा कि वह एक कुशल ड्राइवर और शारीरिक रूप से सक्षम व्यक्ति है, इसलिए कमाने में सक्षम है।

बेंच ने माना कि 5,000 रुपये प्रतिमाह का गुज़ारा-भत्ता मौजूदा महंगाई और जीवन-यापन की लागत को देखते हुए पूरी तरह उचित है।

रिविजन कोर्ट की सीमा

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि रिविजनल कोर्ट अपील अदालत की तरह सबूतों का दोबारा मूल्यांकन नहीं करती। हस्तक्षेप तभी किया जाता है जब आदेश में स्पष्ट गैर-कानूनीपन, मनमानी या ऐसी गंभीर अनियमितता हो जिससे न्याय प्रभावित होता हो।

ऐसी कोई स्थिति इस मामले में नहीं पाई गई, इसलिए पति की रिविज़न याचिका खारिज कर दी गई।

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