कोलकाता। कलकत्ता हाईकोर्ट ने मातृत्व के अधिकार को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि यदि कोई महिला उम्र और स्वास्थ्य के मानकों पर पात्र है, तो उसे आईवीएफ (IVF) उपचार से केवल इसलिए वंचित नहीं किया जा सकता क्योंकि उसके पति की उम्र कानून में निर्धारित सीमा से अधिक है।
जस्टिस कृष्णा राव की एकल पीठ ने कहा, "आईवीएफ के जरिए बच्चे के जन्म की प्रक्रिया में पति की भूमिका सहयोगी की होती है। महिला ही भ्रूण को गर्भ में धारण करती है और बच्चे को जन्म देती है। इसलिए केवल पति की अधिक उम्र के आधार पर किसी महिला के मातृत्व के अधिकार से उसे वंचित नहीं किया जा सकता।"
क्या है मामला?
यह मामला एक ऐसे दंपती से जुड़ा है, जो वर्ष 2014 से संतान प्राप्ति का प्रयास कर रहा है। दंपती एआरटी (ART) बैंक से शुक्राणु और अंडाणु लेकर आईवीएफ उपचार कराना चाहता था। हालांकि, अस्पताल ने यह कहते हुए उपचार देने से इनकार कर दिया कि पति की उम्र 57 वर्ष है।
अस्पताल का तर्क था कि सहायक प्रजनन तकनीक (ART) अधिनियम के अनुसार पुरुष की अधिकतम आयु 55 वर्ष निर्धारित है।
ये भी पढ़िए ...
दिल्ली हाईकोर्ट : स्त्री को मातृत्व सुख पाने के प्रयासों से वंचित नहीं कर सकते
कोर्ट ने क्या कहा?
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि एआरटी अधिनियम किसी पात्र विवाहित महिला को अकेले उपचार कराने से नहीं रोकता। अदालत ने कहा कि इस कानून का उद्देश्य सहायक प्रजनन तकनीक के दुरुपयोग को रोकना है, न कि पात्र महिला को मातृत्व के अधिकार से वंचित करना।
अस्पताल को उपचार उपलब्ध कराने का निर्देश
24 जून को पारित आदेश में जस्टिस कृष्णा राव ने कहा कि 49 वर्षीय महिला गर्भधारण करने के लिए शारीरिक रूप से सक्षम है और निर्धारित आयु सीमा के भीतर है। इसलिए अस्पताल को कानून के अनुरूप दंपती को आईवीएफ उपचार उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया।



Comments
Leave A reply
Your email address will not be published. Required fields are marked *