सुप्रीम कोर्ट : पति-पत्नी के अलग रहने

blog-img

सुप्रीम कोर्ट : पति-पत्नी के अलग रहने
का मतलब ये नहीं कि शादी पूरी तरह से टूट गई...

सुप्रीम कोर्ट ने पति-पत्नी के रिश्ते पर अहम टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि सिर्फ इसलिए कि पति-पत्नी अलग रह रहे हैं, यह नहीं माना जा सकता कि उनकी शादी टूट गई है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले, सबूतों का पूरा विश्लेषण करना बहुत जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने यह बात कही। 

उन्होंने कहा कि आजकल कोर्ट अक्सर यह मान लेते हैं कि अगर लोग अलग रह रहे हैं तो शादी टूट ही गई है लेकिन कोर्ट ने साफ किया कि इस नतीजे पर पहुंचने से पहले फैमिली कोर्ट या हाई कोर्ट को यह तय करना होगा कि आखिर कौन सी पार्टी शादी तोड़ने और दूसरे को अलग रहने पर मजबूर करने के लिए जिम्मेदार है। बेंच ने कहा कि जब तक जानबूझकर छोड़ देने या साथ रहने से इंकार करने का कोई पुख्ता सबूत न हो, तब तक यह मान लेना कि शादी टूट गई है, खासकर बच्चों पर बहुत बुरा असर डाल सकता है।  

कोर्ट ने क्या कहा

कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि ऐसे नतीजे पर पहुंचने के लिए, कोर्ट को रिकॉर्ड पर मौजूद सारे सबूतों का गहराई से विश्लेषण करना चाहिए। साथ ही पार्टियों की सामाजिक स्थिति, उनके बैकग्राउंड और कई अन्य बातों पर भी गौर करना चाहिए। यह फैसला एक महिला की अपील पर आया जिसमें उसने हाई कोर्ट के एक फैसले को चुनौती दी थी। हाई कोर्ट ने पति की तलाक की अर्जी मंजूर कर ली थी और क्रूरता के आधार पर शादी खत्म कर दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के इस फैसले को आंशिक रूप से पलट दिया।  

क्या है मामला

यह मामला 2009 में हुई एक शादी से जुड़ा है। 2010 में उनके एक बेटा हुआ। दुर्भाग्य से, शादी में अनबन के कारण दोनों के बीच मुकदमेबाजी शुरू हो गई। पति ने पहले क्रूरता के आधार पर तलाक की अर्जी दी थी लेकिन बाद में उसे वापस ले लिया।  इसके बाद 2013 में उसने फिर से तलाक की अर्जी दी, इस बार छोड़ देने के आधार पर। पत्नी ने इस अर्जी का विरोध किया। निचली अदालत ने 2018 में पति की तलाक की अर्जी खारिज कर दी थी लेकिन हाई कोर्ट ने पति की अपील मंजूर कर ली और तलाक की आदेश जारी कर दी। 

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि हाई कोर्ट ने पति की बातों को तो मान लिया लेकिन पत्नी की इस दलील पर ध्यान नहीं दिया कि उसे ससुराल से निकाल दिया गया था और अलग रहने पर मजबूर किया गया था। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि यह बात विवादित नहीं है कि बच्चा शुरू से ही पत्नी की कस्टडी में है।  

सुप्रीम कोर्ट ने कहा हाई कोर्ट को सबसे पहले इन बातों पर गौर करना चाहिए 

• क्या पत्नी को ससुराल से निकाला गया था या उसने खुद ही पति को छोड़ दिया था

• क्या पहली तलाक की अर्जी वापस लेने से, उसी वजह पर दूसरी अर्जी दाखिल करने पर रोक लगनी चाहिए थी? 

• क्या पति ने पत्नी को ससुराल में रहने की इजाजत न देकर, या बच्चे को प्यार, देखभाल और गुजारा भत्ता न देकर क्रूरता की थी? 

बेंच ने कहा कि उन्हें ऐसा कोई भी विश्लेषण हाईकोर्ट के फैसले में नहीं मिला। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने मामले को हाई कोर्ट को वापस भेज दिया ताकि वह कानून के मुताबिक नए सिरे से विचार करे। कोर्ट ने दोनों पार्टियों को 24 नवंबर 2025 को हाई कोर्ट में पेश होने का निर्देश दिया है। 

Comments

Leave A reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *



इलाहाबाद हाईकोर्ट : पत्नी के पास अलग रहने
अदालती फैसले

इलाहाबाद हाईकोर्ट : पत्नी के पास अलग रहने , के पर्याप्त कारण, तो गुजारा-भत्ता की हकदार

कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद पाया कि पति और पत्नी के बीच लंबे समय से मुकदमेबाजी चल रही है, जिसमें दहेज उत्पीड़न...

मप्र हाईकोर्ट : 13 साल का रिश्ता है, इसलिए रेप असंभव
अदालती फैसले

मप्र हाईकोर्ट : 13 साल का रिश्ता है, इसलिए रेप असंभव

हाईकोर्ट ने 'आपसी सहमति' बताकर रद्द की लेफ्टिनेंट कर्नल पर हुई FIR

कलकत्ता हाईकोर्ट : पति की नौकरी खतरे में डालना भी क्रूरता
अदालती फैसले

कलकत्ता हाईकोर्ट : पति की नौकरी खतरे में डालना भी क्रूरता

सीआईएसएफ जवान मामले में कोर्ट ने पत्नी के दावे विरोधाभासी पाए

मुस्लिम महिलाओं को समान अधिकार की अर्जी
अदालती फैसले

मुस्लिम महिलाओं को समान अधिकार की अर्जी , पर सुप्रीम कोर्ट  : बराबरी का एक रास्ता UCC भी

CJI ने चिंता जताते हुए कहा कि सुधार की जल्दबाज़ी में कहीं ऐसा न हो कि हम मुस्लिम महिलाओं को मौजूदा अधिकारों से भी वंचित...

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट  : आदिवासी भी हिंदू मैरिज एक्ट के दायरे में
अदालती फैसले

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट  : आदिवासी भी हिंदू मैरिज एक्ट के दायरे में

हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के एक फैसले को रद्द कर दिया और एक आदिवासी समुदाय के व्यक्ति के साथ अनुसूचित जाति की महिला के तल...

बॉम्बे हाईकोर्ट : स्तनपान करने वाली बच्ची का हित मां के साथ
अदालती फैसले

बॉम्बे हाईकोर्ट : स्तनपान करने वाली बच्ची का हित मां के साथ

कोर्ट ने यह आदेश महिला द्वारा अपनी बेटी की कस्टडी की मांग करने वाली बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर दिया गया।