देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों ने हाल के फैसलों में भरण-पोषण (गुजारा भत्ता) को लेकर अहम टिप्पणियाँ की हैं, जिनमें संतुलन, अधिकार और न्याय के सिद्धांतों को स्पष्ट किया गया है। एक ओर जहां इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि भरण-पोषण की राशि न तो इतनी अधिक हो कि पति पर असहनीय बोझ बन जाए और न ही इतनी कम कि पत्नी-बच्चे अभाव में रहें। वहीं छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल दूसरी शादी या चूड़ी प्रथा के आरोप भर से पत्नी को गुजारा भत्ते से वंचित नहीं किया जा सकता। उधर आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने दो टूक कहा कि गुजारा भत्ता कोई खैरात नहीं, बल्कि पत्नी और आश्रितों का वैधानिक अधिकार है।
इलाहाबाद हाई कोर्ट: भरण-पोषण की रकम संतुलित हो, पति पर असहनीय बोझ न बने
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भरण-पोषण के एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि गुजारा भत्ता न तो इतना अधिक होना चाहिए कि पति के लिए असहनीय बोझ बन जाए और न ही इतना कम कि पत्नी और बच्चे अभाव में जीवन बिताने को मजबूर हों। न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह की एकलपीठ ने पारिवारिक न्यायालय द्वारा तय 16 हजार रुपये प्रतिमाह की राशि को घटाकर 8 हजार रुपये प्रतिमाह कर दिया।
फतेहपुर के पारिवारिक न्यायालय ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत पति की आय लगभग 32 हजार रुपये प्रतिमाह मानते हुए पत्नी को 10 हजार और बेटे को 6 हजार रुपये देने का आदेश दिया था। हाई कोर्ट ने माना कि सामान्यतः पति की शुद्ध आय का लगभग 25 प्रतिशत भरण-पोषण के रूप में उचित हो सकता है। इसी आधार पर कुल राशि 8 हजार रुपये प्रतिमाह तय की गई, जो आवेदन की तिथि से देय होगी।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट: चूड़ी प्रथा के आरोप से नहीं छिनेगा पत्नी का भरण-पोषण अधिकार
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अपने अहम फैसले में कहा है कि केवल दूसरी शादी या ‘चूड़ी प्रथा’ से विवाह के आरोप मात्र से पत्नी को भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता। जब तक ऐसे आरोप ठोस साक्ष्यों से सिद्ध न हों, तब तक पत्नी का गुजारा भत्ता पाने का अधिकार समाप्त नहीं होता।
जशपुर जिले के एक मामले में पति ने दावा किया कि उसकी पत्नी ने अपनी इच्छा से घर छोड़ा और बिहार में किसी अन्य व्यक्ति से चूड़ी विवाह कर लिया, इसलिए वह भरण-पोषण की हकदार नहीं है। हालांकि फैमिली कोर्ट ने साक्ष्यों के आधार पर पत्नी के पक्ष में फैसला दिया था। हाईकोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने सभी तथ्यों और दस्तावेजों पर विचार करने के बाद आदेश पारित किया है, इसलिए उसमें हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं है। कोर्ट ने पति की अपील खारिज करते हुए पत्नी को गुजारा भत्ता देने का आदेश बरकरार रखा।
आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट: गुजारा भत्ता खैरात नहीं, वैधानिक अधिकार
आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अलग रह रही पत्नी को दिया जाने वाला गुजारा भत्ता कोई दान या खैरात नहीं, बल्कि उसका कानूनी अधिकार है। अमरावती में सुनवाई करते हुए जस्टिस वाई लक्ष्मण राव की पीठ ने पारिवारिक न्यायालय के आदेश को बरकरार रखा, जिसमें पत्नी को 7,500 रुपये और नाबालिग बेटे को 5,000 रुपये प्रतिमाह भत्ता देने का निर्देश दिया गया था।
अदालत ने कहा कि गुजारा भत्ता न्याय, निष्पक्षता और सामाजिक संतुलन बनाए रखने की व्यवस्था है, ताकि कोई भी आश्रित उपेक्षा के कारण आर्थिक तंगी में जीवन न बिताए। कोर्ट ने यह भी दोहराया कि जब कानून किसी व्यक्ति पर भरण-पोषण की जिम्मेदारी डालता है, तो उससे बचना न केवल नैतिक रूप से गलत है बल्कि कानून की भावना के भी विरुद्ध है। हाई कोर्ट ने पति की उस दलील को खारिज कर दिया जिसमें उसने पारिवारिक न्यायालय के आदेश को अत्यधिक और मनमाना बताया था, और निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया।



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