Karnataka High Court ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि अगर पत्नी पति पर HIV/AIDS जैसी गंभीर बीमारी होने का आरोप लगाती है, तो केवल इस आरोप के आधार पर उसे मानसिक क्रूरता मानकर तलाक नहीं दिया जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त और ठोस सबूत जरूरी हैं।
जस्टिस Suraj Govindaraj और डॉ. जस्टिस Chillakur Sumalatha की डिवीजन बेंच ने फैमिली कोर्ट द्वारा दिया गया तलाक का आदेश रद्द कर दिया।
मामले में पति ने आरोप लगाया था कि पत्नी और उसके परिवार ने उसके साथ दुर्व्यवहार किया, गाली-गलौज की और उस पर HIV/AIDS से पीड़ित होने का झूठा आरोप लगाया। पति ने इसे मानसिक क्रूरता बताते हुए तलाक की मांग की थी।
हालांकि हाईकोर्ट ने कहा कि पति ने अपने आरोपों के समर्थन में कोई दस्तावेज़ी सबूत, शिकायत, पत्राचार या स्वतंत्र गवाह पेश नहीं किया। अदालत ने कहा कि केवल पति की व्यक्तिगत गवाही के आधार पर इतने गंभीर आरोपों को सही मान लेना उचित नहीं है।
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कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर ऐसे आरोप साबित हो जाते तो वे निश्चित रूप से हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(ia) के तहत मानसिक क्रूरता माने जा सकते थे, क्योंकि HIV/AIDS जैसे आरोप सामाजिक कलंक से जुड़े होते हैं। लेकिन बिना सबूत अदालत केवल “व्यक्तिपरक संतुष्टि” के आधार पर फैसला नहीं दे सकती।
यह मामला बीदर फैमिली कोर्ट के फैसले से जुड़ा था, जहां पति को मानसिक क्रूरता के आधार पर तलाक दे दिया गया था। अब Karnataka High Court ने उस फैसले को रद्द करते हुए कहा कि गंभीर आरोपों के मामलों में न्यायालय को ठोस और विश्वसनीय साक्ष्यों पर ही भरोसा करना चाहिए।



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