नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने घरेलू हिंसा के एक गंभीर मामले में आरोपी पति को राहत देने से इनकार करते हुए कड़ी टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि कोई भी व्यक्ति अपनी पत्नी के साथ जानवरों जैसा व्यवहार नहीं कर सकता और हर महिला को सम्मान और गरिमा के साथ जीने का अधिकार है।
यह टिप्पणी जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पीबी वराले की पीठ ने आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान की। आरोपी पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज है। इससे पहले पटना हाईकोर्ट भी उसकी जमानत याचिका खारिज कर चुका है।
शराब के नशे में पत्नी से मारपीट का आरोप
अभियोजन पक्ष के अनुसार आरोपी ने शराब के नशे में अपनी पहली पत्नी के साथ बेरहमी से मारपीट की। आरोप है कि उसने पत्नी को जमीन पर पटक दिया जिससे उसका सिर ईंट से टकरा गया। इसके बाद आरोपी ने लाठी से भी हमला किया।
मामले में यह भी सामने आया कि आरोपी ने तीन शादियां की हैं। हालांकि अदालत में उसने शिकायतकर्ता महिला से विवाह होने की बात से इनकार किया।
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सुप्रीम कोर्ट ने पूछे कड़े सवाल
सुनवाई के दौरान जस्टिस पीबी वराले ने कहा कि पत्नी के साथ अमानवीय व्यवहार का कोई औचित्य नहीं हो सकता। वहीं जस्टिस अरविंद कुमार ने आरोपी से पूछा, “आप अपनी पत्नी को क्यों मारना चाहते हैं?”
कोर्ट ने कहा कि इतने गंभीर आरोपों को देखते हुए आरोपी को अग्रिम जमानत नहीं दी जा सकती। अदालत ने उसे नियमित जमानत के लिए आवेदन करने की सलाह दी।
जज ने साझा किया अनुभव
सुनवाई के दौरान जस्टिस अरविंद कुमार ने घरेलू हिंसा से जुड़ा अपना अनुभव भी साझा किया। उन्होंने बताया कि कानूनी सहायता कार्यक्रम के दौरान उन्होंने देखा कि हर शनिवार पुलिस थानों में बड़ी संख्या में घरेलू हिंसा के मामले दर्ज होते थे।
उन्होंने कहा कि एक थाने में अक्सर पत्नी शिकायतकर्ता होती थी और आरोप होता था कि पति मजदूरी मिलने के बाद शराब पीकर मारपीट करता है। वहीं दूसरे थाने में पति शिकायतकर्ता बनकर पहुंचता था।
जस्टिस कुमार ने कहा कि कई महिलाओं की शिकायत यही होती थी कि उन्हें पति के शराब पीने से दिक्कत नहीं है लेकिन उनके साथ मारपीट नहीं होनी चाहिए।
महिलाओं के सम्मान पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा संदेश
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान को लेकर महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी महिला के साथ हिंसा या अमानवीय व्यवहार को कानून किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं करता।



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