फातिमा बानो : मजहबी बंदिशों को तोड़ बनीं पहलवान

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फातिमा बानो : मजहबी बंदिशों को तोड़ बनीं पहलवान

छाया : स्व संप्रेषित 

• सीमा चौबे 

दकियानूसी सोच को चुनौती देते हुए भोपाल की फातिमा बानो को देश की पहली मुस्लिम महिला कुश्ती प्रशिक्षक होने का गौरव हासिल है। एक अरसे से वे अपनी तरह सैकड़ों बेटियों को पहलवान बनाने में जुटी हुई हैं। प्रारम्भ में जूडो खिलाड़ी रहीं फातिमा ने कोच के कहने पर कुश्ती में हाथ आजमाया और दोनों ही खेलों में अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। वर्ष 1997 में जब उन्होंने कुश्ती में पदार्पण किया, उस समय तक इस खेल में पुरुषों का ही वर्चस्व था। आज की तारीख़ में फातिमा, मप्र के सर्वोच्च खेल पुरस्कार 'विक्रम अवार्ड' से सम्मानित होने वाली राज्य की पहली कुश्ती खिलाड़ी हैं। इतना ही नहीं 68 केजी कुश्ती वर्ग में भारत की पहली महिला स्वर्ण पदक विजेता होने का खिताब भी उनके नाम है। गीता-बबीता फोगाट और साक्षी मलिक जैसी नामी पहलवानों को राष्ट्रीय प्रशिक्षण शिविर में ट्रेनिंग दे चुकी फातिमा के लिए कुश्ती का यह सफर काफी चुनौतियों से भरा रहा है।

सैयद नसरुल्लाह और निशा बानो की पांच संतानों (चार बहन, एक भाई) में चौथी संतान के रूप में 7 जून 1975 को फातिमा का जन्म भोपाल में हुआ उनके पिता भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स (भेल) में सेवारत थे, जबकि मां गृहिणी थीं। फातिमा ने दसवीं तक की शिक्षा प्रगतिशील स्कूल, पिपलानी से तथा 11वीं और 12वीं की पढ़ाई गवर्नमेंट गर्ल्स हायर सेकेंडरी स्कूल बरखेड़ा से की। आर्ट्स विषय के साथ स्नातक नूतन कॉलेज से करने के बाद भेल कॉलेज से समाजशास्त्र विषय से स्नातकोत्तर तथा एनआईएस डिप्लोमा पटियाला से प्राप्त किया।

भेल के छोटे से क्वार्टर में साधारण मध्यमवर्गीय परिवार में पली-बढ़ी फातिमा को बचपन से ही अपने आसपास खेल का माहौल मिला। मोहल्ले के लगभग सभी बच्चे भेल स्पोर्ट्स क्लब जाया करते थे। लेकिन अपने परिवार में केवल फातिमा को ही खेलों से लगाव था। हालांकि उन्होंने भेल स्पोर्ट्स क्लब में दाखिला नहीं लिया था। शुरुआत में वे स्कूल में होने वाली खेल प्रतियोगिताओं में ही भाग लेती रहीं और अनेक पुरस्कार जीते। उनकी प्रतिभा को देखते हुए स्कूल की ही एक शिक्षिका ने उन्हें भेल स्पोर्ट्स क्लब जाने के लिए प्रोत्साहित किया। इसके बाद वे वर्ष 1992 से क्लब में कबड्डी सीखने जाने लगीं।

राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी फातिमा ने करीब ढाई साल तक कबड्डी में हाथ आजमाया। उनके प्रदर्शन को देखते हुए दिल्ली के श्री गुरुशरण गोगी ने उन्हें जूडो सीखने की सलाह दी। उनके बार-बार कहने पर फातिमा एक बार गुस्से में उनके पास जूडो सीखने यह सोचकर गईं कि बार-बार जूडो के लिए बुलाते हैं, तो चलो देखते हैं ऐसा क्या है जूडो में?  लेकिन यही समय उनके जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ, जिसने उनके कैरियर की दिशा ही बदल दी।

इस तरह 1994 में उन्होंने गोगी जी से जूडो का प्रशिक्षण लेना शुरू किया, लेकिन कुछ दिनों बाद ही उनका तबादला दिल्ली हो गया, लेकिन गोगी जी ने उन्हें जूडो के इतने गुर सिखा दिए थे कि इसके बाद वे अकेले ही लगातार अभ्यास करती रहीं और राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में करीब 14 पदक अपने नाम किये।

वर्ष 97 में लड़कियों के लिए कुश्ती की शुरुआत हुई। उस समय उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि यहाँ से उनके लिये एक नया रास्ता खुलने वाला है। दरअसल उनके घर के पास ही एक जूडो क्लब था जिसमें आने वाली लड़कियों ने ही कुश्ती खेलने की शुरुआत की। यहाँ हैदराबाद में होने वाली राष्ट्रीय कुश्ती प्रतियोगिता के लिए खिलाड़ियों को परखा जा रहा था। एक अन्य सेंटर के कोच ने फातिमा को भी ट्रायल देने की सलाह दी। उन्होंने पहले कभी कुश्ती में हाथ नहीं आजमाया था, लेकिन फातिमा ने ट्रायल दिया और प्रतियोगिता के लिए उनका चयन हो गया।

कहना होगा कि फातिमा जिस समुदाय से आती हैं, वहां लड़कियों को कुश्ती जैसे खेल के लिए परिवार को राज़ी करना आसान नहीं था। अब सबसे बड़ी समस्या थी घर में माता-पिता को कैसे इस बात की जानकारी दें और कैसे उन्हें इस बात के लिए तैयार करें? जैसे-तैसे हिम्मत जुटाकर उन्होंने जब यह बात माँ-पिता को बताई तो कुछ देर के लिए घर में सन्नाटा छा गया। तमाम तरह की दुहाइयाँ देकर पहले तो उन्होंने मना कर दिया, लेकिन फातिमा के ज़ोर देने पर वे तैयार हो गए। परिवार की इजाज़त तो उन्हें मिल गई लेकिन फिर समाज के ताने भी सुनने को मिले। जब वे घर से बाहर निकलतीं तो लोग आपस में कहते “हट जाओ, रास्ता दो, सामने से पहलवान रही है।”

1997 में हैदराबाद में खेले अपने पहले नेशनल में ही फातिमा ने राष्ट्रीय स्वर्ण पदक जीतकर सभी को आश्चर्यचकित कर दिया। दरअसल यह उपलब्धि हासिल करना इतना आसान नहीं था, क्योंकि इसमें राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर के धुरंधर खिलाड़ी हिस्सा ले रहे थे। उस समय तक फातिमा को कुश्ती के नियम भी ठीक तरह से नहीं पता थे।

फातिमा बताती हैं - “यह हमारी खुशकिस्मती ही थी कि हमारा जो भार वर्ग था, उसकी प्रतियोगिता दो दिन बाद होनी थी। इसलिए हमसे पहले होने वाली कुश्ती प्रतियोगिता के दांव-पेंच देख-देख कर वहीं से हमने सीखा कि इसके नियम क्या हैं और सामने वाले को कैसे पटखनी देनी है। हालांकि जूडो और कुश्ती की टेक्निक 80 प्रतिशत मिलती जुलती है, केवल ग्राउंड पोजीशन में अंतर होता है।” यहाँ 68 किलो भार वर्ग में पहला गोल्ड जीतने के बाद उत्साह बढ़ा और कुश्ती में रुचि जागी। वर्ष 2000 तक जूडो और कुश्ती दोनों में उत्कृष्ट प्रदर्शन करती रहीं। लेकिन करीब पांच नेशनल खेलने के बाद उनके घुटने में दो बार चोट लगी और ऑपरेशन के बाद उन्हें कुश्ती छोड़ना पड़ा।

इसी बीच बुधवारा स्थित अखाड़ा ट्रेनिंग स्कूल के संचालक शाकिर नूर जी से उनकी मुलाक़ात हुई। उन्होंने फातिमा को कुश्ती की अनेक ऐसी तकनीकों से परिचित कराया, जिससे फातिमा अभी तक अनभिज्ञ थीं। दरअसल नूर भी चाहते थे कि कुश्ती में महिला पहलवानों की भागीदारी बढ़े। उन्होंने महिला पहलवानों को कभी पुरुष पहलवानों से कम नहीं समझा। वे महिला पहलवानों का हौसला हमेशा बढ़ाते रहे। उनके प्रोत्साहन से ही फातिमा ने पूर्णकालिक कोचिंग के लिए वर्ष 2002 में पटियाला (पंजाब) में एक पहलवान के रूप में एनआईएस प्रशिक्षण लिया।

2003 से फातिमा ने अखाड़ा ट्रेनिंग स्कूल से कोच के रूप में काम करना शुरू किया। वर्ष 2004 में टी.टी. नगर स्टेडियम में संविदा  प्रशिक्षक के रूप में नौकरी लग गई। वर्ष 2007 में रेसलिंग अकादमी खुलने के बाद पदोन्नत होकर मुख्य प्रशिक्षक के रूप में वर्ष 2016 तक खेल विभाग में अपनी सेवाएं दीं। इस दौरान उन्होंने गांव-देहात से ऐसी प्रतिभाएं खोजीं, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पर भारत का नाम रोशन किया। उन्होंने अनेक  राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय खेल शिविरों में भागीदारी करते हुए भारत सहित अमेरिका, कज़ाकिस्तान और किर्गिस्तान में भी खिलाड़ियों को कुश्ती में प्रशिक्षित किया। लेकिन स्वतंत्र रूप से कार्य नहीं कर पाने के कारण वर्ष 2016 में उन्होंने नौकरी छोड़ दी और हर लड़की को कुश्ती खेलने की आज़ादी मिले, इस सोच के साथ वापस अखाड़ा ट्रेनिंग स्कूल में नि:शुल्क पहलवानी सिखाना शुरू किया।

2008 में विश्वामित्र सम्मान से विभूषित श्री शाकिर नूर से उनका निकाह हो गया, जिसके बाद पारिवारिक दायित्वों के साथ-साथ वे प्रशिक्षक की ज़िम्मेदारी भी भलीभांति निभाती रहीं हैं। पैसा किसी खिलाड़ी के लिए उसके कैरियर में बाधा बने इसीलिए पति के साथ मिलकर बच्चों को निशुल्क पहलवानी के दांव-पेंच सिखा रही हैं। इस अखाड़े की सबसे खास बात यह है कि यहाँ कुश्ती सीख रहीं ज्यादातर लड़कियां ग्रामीण क्षेत्र की हैं। अब तक हजारों बच्चे यहाँ से पहलवानी सीख चुके हैं, उनमें से 5 सौ तो राष्ट्रीय पदक विजेता हैं, जबकि 70 बच्चे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कोई कोई ख़िताब जीत चुके हैं। इसी तरह लगभग ढाई सौ खिलाड़ी आज सरकारी नौकरियों में हैं।

अखाड़े में अभी 30 से 35 बच्चे रोज पहलवानी सीखने आते हैं। जिनमे 12 लड़कियां शामिल हैं। घुटनों की चोट के चलते ओलम्पिक नहीं खेल पायीं फातिमा का सपना भविष्य में ऐसे खिलाड़ी तैयार करना है, जो उनके लिए ओलम्पिक खेले और पदक हासिल करे। ग्रामीण क्षेत्र से ही आने वाली ज्योति, सुषमा और शिवानी में उन्हें सम्भावनाएं नज़र आती हैं।

फातिमा उन महिलाओं के लिए एक प्रेरणास्रोत भी बन चुकी हैं, जो पारिवारिक या सामाजिक दबाव के कारण अपने हुनर का गला घोंट देती हैं। वे खुद के पहलवान होने पर गर्व महसूस करती है और अपने पेशे का पूरा आनंद लेती हैं।वे कहती हैं, पुरुषों के वर्चस्व वाले इस खेल को अपनाने के लिए महिलाओं को लगातार बाधाओं से लड़ना पड़ता है, लेकिन जब लड़कियों को रिंग में अभ्यास करते देखती हूँ तो बहुत अच्छा लगता है। वे बताती हैं कि शुरुआत में मुझे भी काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा। कई बार लड़के सामने ही लंगोट बदल लेते थे, जिसे देख मै बहुत असहज हो जाती थी। वहीं सामाजिक बंदिशें भी थीं। कई बार कुश्ती खेलने से रोकने का प्रयास हुआ। अगर उस दौरान हार मान लेती तो आज मुझे यह मुकाम मिल पाता।

फातिमा, सामाजिक संस्था ‘सरोकार’ से भी जुड़ी हैं। उनकी बड़ी बहनें - आशिया भोपाल में, अस्मा हैदराबाद में और सलमा मुंबई में अपनी-अपनी गृहस्थी सम्भाल रही हैं। भाई मो. सलीम भोपाल में फर्नीचर व्यवसाय से जुड़े हैं।

प्रमुख  उपलब्धियां

• पहली महिला सीनियर रेसलिंग चैंपियनशिप, हैदराबाद - स्वर्ण पदक (1997)

• दूसरी महिला सीनियर नेशनल रेसलिंग चैम्पियनशिप, नासिक - कांस्य पदक  (1998)

• एशियन जूडो चैंपियनशिप, चाइना- पांचवां स्थान प्राप्त किया (1999 )

• चौथी महिला सीनियर नेशनल रेसलिंग चैंपियनशिप,अमरावती -कांस्य पदक (2000)

• मध्यप्रदेश सरकार द्वारा विक्रम अवार्ड से सम्मानित ( 2001)

• इसी तरह जूडो में राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में भाग लेकर 3 रजत  एवं 6 कांस्य पदक अर्जित किए हैं

कोच के रूप में:-

वर्ष 2004 से लेकर 2006 तक तथा वर्ष 2016 -17 में अनेक राष्ट्रीय कुश्ती प्रशिक्षण शिविरों में देश के सब जूनियर, जूनियर तथा सीनियर खिलाडिय़ों को प्रशिक्षण दिया

• कोच की हैसियत से विदेशों में देश के कुश्ती दलों को सम्मिलित करवाया जिसमें प्रमुख रूप से चाइना, अमेरिका, कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान, किर्गिस्तान, फिलीपींस, फिनलैंड आदि शामिल हैं। इसके अतिरिक्त अनेकों, राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में सफल निर्णायक के रूप में अहम भूमिका निभाती रही हैं

• अखाड़ा ट्रेनिंग स्कूल में 2016 के उपरांत से आज तक इनके द्वारा प्रशिक्षित  खिलाडिय़ों ने 22 अंतर्राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगितों में भागीदारी कर 9 पदक, राष्ट्रीय स्तर पर 160 पदक तथा राज्य स्तर पर 360 पदक जीते हैं

• अकादमी में रहते हुए तथा स्वयं के सेंटर अखाड़ा ट्रेनिंग स्कूल भोपाल में जिन खिलाडिय़ों ने अतिरिक्त उपलब्धियां हासिल की हैं उनमें एनआईएस डिप्लोमा कोर्स में 5 खिलाड़ी, हरियाणा पुलिस में 2 खिलाड़ी, बीएसएफ में 2 खिलाड़ी, पीटीआई में 1 खिलाड़ी, मध्यप्रदेश पुलिस में 3 खिलाड़ी, एमएसबी में 1 खिलाड़ी, आईटीबी में 2 खिलाड़ी शामिल हैं

सन्दर्भ स्रोत : फातिमा बानो से सीमा चौबे की बातचीत पर आधारित

© मीडियाटिक

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