• सारिका ठाकुर
मामोला बाई कौन थीं और भोपाल के दूसरे नवाब यार मोहम्मद खान की पत्नी कैसे बनीं इस बात को लेकर तरह-तरह की कहानियाँ प्रचलित हैं, लेकिन सही-सही जानकारी नहीं मिलती। एक कहानी यह है कि उन्हें यार मोहम्मद को बतौर माले-गनीमत सौंपा गया था। वे इस सम्बन्ध में शहरयार खान लिखते हैं कि “भोपाल के इतिहासकारों ने - ख़ास तौर पर स्वयं बेगमों ने मामोला बाई से जुडी जानकारियों पर पर्दा डाल दिया।”
वर्तमान पीढ़ी के लोग भले ही उनके बारे में कुछ नहीं जानती हो और इतिहास के पन्नों पर भी उनके बारे में न के बराबर लिखा गया हो फिर भी भोपाल के हिन्दू और मुसलमान दोनों ही समाज में मामोला बाई का नाम इज्ज़त से लिया जाता रहा है। इस शहर के पुराने बाशिंदों के जहन में आज भी कुछ यादें बचीं हुई हैं जो उन्होंने मामोला बाई यानी मांजी साहेबा के बारे में अपनी पिछली पीढ़ी के मुँह से सुना था। भोपाल के दूसरे नवाब यार मोहम्मद खां की पत्नी के रूप में उन्होंने अपनी गरिमा का पूरी तरह निर्वाह किया और उनके बाद दो सौतेले बेटों फैज मुहम्मद खां और फ़तेह मुहम्मद खान के नाम से पचास वर्षों तक भोपाल की रियासत पर शासन किया।
कुछ लोगों का मानना है कि वे यार मुहम्मद द्वारा पराजित किसी ठाकुर परिवार की पुत्री थीं, किसी के अनुसार वे कोटा के राजपूत जमींदार की बेटी थीं, तो कुछ लोगों के अनुसार वे उत्तर भारत की ब्राह्मण कन्या थीं।
वह ऐसा दौर था जब भोपाल रियासत में एक भी शक्तिशाली पुरुष नहीं बचा था। मामोला बाई ने अंदरूनी राजनीति को संभालते हुए बाहरी शत्रुओं से भी रियासत की रक्षा की। उनके शासन काल में उनकी नीति किसी भी सूरत में राज्य को बचाने की रही। युद्ध की स्थिति निर्मित होने पर काफी सोच विचार के बाद ही वे सीधे टकराव की अनुमति देती थीं। उनके शासन काल में दो तीन महत्वपूर्ण घटनाएँ हुईं जैसे - फ़ैज़ मुहम्मद के चाचा द्वारा बगावत करने और असफल होने पर क्षमादान माँगने पर उन्हें कुरवाई (अब विदिशा जिले का एक कस्बा) देकर माफ़ कर देना, मराठों के साथ पहली बार हुई संधि में पचास प्रतिशत से ज्यादा भू भाग और दोबारा हुई संधि में कुछ और भू भाग उन्हें देकर राज्य में शांति स्थापित करना, बाद में अंग्रेजों के आगमन पर जर्नल गोडार्ड की आवभगत करना। जनरल गोडार्ड द्वारा भेजी गई रिपोर्ट के आधार पर ही आगे चलकर अंग्रेजों के साथ भोपाल रियासत मैत्री स्थापित हो सकती थी।
शहरयार खान ने अपनी पुस्तक में अनेक स्थानों पर उल्लेख किया है कि वे गरीबों के प्रति बहुत ही संवेदनशील थीं, वे तब तक खाना नहीं खाती थीं जब तक उन्हें विश्वास न हो जाए कि सभी ने खाना खा लिया है। कुछ सत्ता के लिए लालायित रिश्तेदारों को छोड़ दिया जाय तो उनकी हिन्दू और मुसलमान दोनों ही सम्मान करते थे। यार मुहम्मद की विवाहित मुस्लिम पत्नियों से पाँच पुत्र थे - फ़ैज़, हयात, सईद, हुसैन और यासीन। मामोला निःसंतान थीं इसलिए वे इन् बच्चों के प्रति अपनी संतान की तरह स्नेह रखती थीं। इतिहासकार सर जॉन माल्कम के अनुसार उन्होंने यार मोहम्मद से शादी नहीं की थी, जबकि शहरयार खान के अनुसार उनकी यार मोहम्मद खान से शादी हुई और उन्होंने इस्लाम अपना लिया था लेकिन उन्होंने अपना नाम नहीं बदला जैसा कि अन्य धर्म में विवाह करने पर मुसलमानों की परंपरा रही है। दूसरी तरफ नाम न बदलने की वजह से ही कुछ लोग विश्वास करते हैं कि दोनों का विवाह कभी नहीं हुआ और उन्होंने कभी अपना धर्म परिवर्तन नहीं किया। अपने जीवनकाल में उन्होंने तीन मस्जिदों का निर्माण करवाया, इसलिए यह बात तार्किक नहीं लगती।
भोपाल पर यार मोहम्मद ने 14 सालों तक शासन किया। तब तक भोपाल में शांति रही। उस समय मराठे बड़ी ताकत बनकर उभरे थे जिनके साथ उन्होंने समझौता करने में ही भलाई समझी। सन 1742 में मात्र 32 वर्ष की आयु में यार मोहम्मद खां का बीमारी के बाद निधन हो गया। इसके बाद परिवार के भीतर गद्दी के लिए संघर्ष शुरू हो गया। यार मोहम्मद के महत्वाकांक्षी सौतेले भाई सुलतान मोहम्मद खां ने एक बार फिर गद्दी हथियाने के लिए प्रयास करना शुरू कर दिया। यहाँ उल्लेखनीय है कि दोस्त मोहम्मद के निधन के समय यार मोहम्मद, निज़ाम हैदराबाद के पास बंदी थे। दोस्त की मौत की ख़बर सुनने के बाद उन्हें रिहा कर दिया गया, उस समय यार मोहम्मद की उम्र 18 वर्ष थी, वे जब तक भोपाल पहुँचते तब तक उनके चाचा 8 वर्ष के सौतेले भाई सुलतान मोहम्मद खान को गद्दी पर बैठा चुके थे। यार के पहुंच जाने के बाद सुल्तान को गद्दी छोड़नी पड़ी थी। वे वारिस थे इसलिए नहीं बल्कि निज़ाम ने उन्हें गद्दी का हक़दार बनाकर भेजा था। दोस्त मोहम्मद अपने जीवनकाल में ही निज़ाम से पराजित हो चुके थे। निज़ाम दोस्त को किलेदार बनाकर वापस हैदराबाद चले गए। जाते समय उन्हें भारी भरकम नज़राना पेश किया गया था और नज़राने की बाकी रकम के एवज में दोस्त ने उन्हें अपना बेटा यार मोहम्मद खां सौंप दिया था। इसके चार साल बाद दोस्त गुजर गए और निज़ाम की वजह से उनके पुत्र यार मोहम्मद भोपाल की गद्दी पर बैठे।
उसी यार मोहम्मद के गुज़र जाने के बाद सुलतान मोहम्मद एक बार फिर तकदीर आज़माने निकल पड़े। उन्होंने परिवार के अन्य बागी और अपने छोटे भाई सरदार मोहम्मद के साथ फतेहगढ़ किले पर कब्ज़ा कर लिया, इसके बाद पड़ोसी मराठा राज्यों से समर्थन माँगा और बदले में भोपाल के पाँच प्रमुख किलों में से एक उन्हें देने का वादा किया। इधर बेवा मामोला बाई इस्लाम नगर के बागियों का सामना कर रही थीं। उन्होंने यार मोहम्मद के 11 वर्षीय बड़े पुत्र फ़ैज़ मोहम्मद को नवाब की गद्दी पर बिठा दिया। उस समय रियासत के दीवान भरोसेमंद बिज्जेराम थे, जो रियासत की तीसरी पीढ़ी की सेवा के लिए ईमानदारी से तत्पर थे।
उन्होंने 5 हज़ार सैनिकों को इकट्ठा किया और ईदगाह पहाड़ी पर सुल्तान की सेना का सामना किया। वह कोई योजनाबद्ध युद्ध की स्थिति नहीं थी बल्कि एक अराजक सा माहौल था। सुल्तान के लोग शहर में उपद्रव मचा रहे थे और जो भी दिखाई देता, उसी पर हमला कर रहे थे। इस बीच मराठा सरदार होलास राय ने भी सुल्तान को धोखा दे दिया और सुल्तान की सेना हार गयी। इसके बाद सुल्तान मोहम्मद ने आत्म समर्पण कर दिया और मामोला बाई से माफ़ी माँगी। उसे इस शर्त पर छोड़ा गया कि वह कभी गद्दी पर दावा नहीं करेगा। इसके बाद सुल्तान मोहम्मद कुरवाई चला गया। इस तरह मामोला बाई यार मोहम्मद खां के बेटे को भोपाल का तीसरा नवाब बनाने में कामयाब रहीं। फ़ैज़ मोहम्मद की उम्र कम थी इसलिए वास्तविक शक्ति मामोला बाई के हाथ में ही रही। वे बिज्जेराम की सहायता से राज्य चलाने लगीं। उस वक़्त मामोला बाई की उम्र भी मात्र 27 वर्ष ही थी।
भोपाल के नए नवाब फ़ैज़ मोहम्मद की बचपन से ही धार्मिक गतिविधियों में गहरी रूचि रही। उनका स्वभाव भी संत जैसा ही था। युवा होने पर भी राजकाज में उन्होंने रूचि नहीं ली। उन्होंने अपने समस्त अधिकार मामोला बाई को सौंप दिये थे। वे इस्लाम के सूफ़ी पंथ के समर्थक थे और सूफियों जैसा जीवन भी जीते थे। जल्द ही उनका नाम भोपाल से बाहर निकलकर चारों ओर फ़ैल गया। रियासत की प्रजा उन्हें संत के रूप में ही सम्मान देती थी। इस दौरान भोपाल रियासत के आर्थिक मामलों, सैन्य गतिविधियों और अनुशासन की कमान, अधिकारियों की नियुक्ति और पड़ोसी राज्यों से सम्बन्ध जैसे मामले पूरी तरह मामोला बाई के हाथों में रहते थे।
1745 में पेशवा बालाजी राव ने मालवा पर अपना दबदबा बनाने की कोशिश की। यह वही समय था जब नादिर शाह ने दिल्ली पर हमला किया था और बाजीराव पेशवा की मौत हुई थी। पेशवा ने भोपाल राज्य के अधीन क्षेत्रों पर भी हमला करवाना शुरू कर दिया।
इसके बाद दौलतराव सिंधिया के नेतृत्व में एक बहुत बड़ी सेना ने भेलसा ! किले को घेर लिया और यार मोहम्मद की सेना को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। इस मौके पर मामोला बाई ने संयम बरतने की सलाह दी और उन्हीं की सलाह पर 2 मार्च 1745 को फैज और पेशवा के बीच एक संधि हुई जिसमें भोपाल के लगभग आधे इलाके पर मराठों का कब्ज़ा हो गया। इसके साथ ही पेशवा को आर्थिक और भौतिक सहायता भी प्रदान की गई, जिसके बदले फ़ैज़ को अपने छोटे राज्य में शासन करने की अनुमति मिली साथ ही रायसेन का महत्वपूर्ण किला भी बच गया। दरअसल मराठों को उकसाने का काम यार के भाई और फ़ैज़ के चाचा वसील मोहम्मद खान ने किया था। उन्हें यह उम्मीद थी कि फ़ैज़ को गद्दी से उतारकर मराठे उसे नवाब बना देंगे। लेकिन नतीजा वैसा नहीं हुआ जैसा उसने सोच रखा था, बल्कि 1745 की संधि ने वसील के मंसूबों पर पानी फेर दिया, उन्हें कुछ गाँव देकर बर्खास्त कर दिया गया और मामोला-फ़ैज़ शासन को और भी मजबूती मिली। इसके बाद लगभग एक दशक तक भोपाल में शांति छाई रही, मराठों ने भी परेशान नहीं किया क्योंकि अब उनका लक्ष्य दिल्ली दरबार था। इस तरह मामोला ने राज्य से बेदखल होने की बजाय कुछ क्षेत्र देकर राज्य में शांति बहाल करना बेहतर समझा। उस समय रायसेन किले पर मुग़ल दरबार का नाम मात्र के लिए ही कब्ज़ा था। मराठों की अनुमति मिल जाने के बाद मामोला बाई ने रायसेन किले पर व्यक्तिगत रूप से ध्यान देना शुरू कर दिया। उन्होंने बिज्जेराम को दिल्ली के बादशाह आलमगीर 2 के पास भेजा और रायसेन का किला भोपाल नवाब को सुपुर्द कर देने का अनुरोध किया। इधर आलमगीर भी उस समय कठिन समय से गुजर रहे थे, इसलिए उन्होंने भी मंजूरी दे दी।
उस समय भोपाल पर बाहरी ख़तरा नहीं था लेकिन रियासत के भीतर साज़िशें तेज हो गई थीं। भोपाल में सत्तारूढ़ परिवार के भीतर से ही मतभेद और षड्यंत्र उभर कर सामने आने लगे। यह मानना उचित है कि बर्रुकट पठान, जो खुद को राज्य का प्रमुख और रक्षक मानते थे, दो बाहरी हिन्दुओं द्वारा सत्ता पर वर्चस्व को स्वीकार नहीं कर पा रहे थे। वफ़ादार मुख्यमंत्री बिज्जेराम और धर्मांतरित विधवा मामोला बाई उनकी आँखों में अब खटकने लगे थे। उनके मन में यह धारणा बनने लगी कि पठानों द्वारा स्थापित भोपाल रियासत पर हिन्दू राज हावी हो रहा है। इन षड्यंत्रकारियों ने स्पष्ट रूप से दोस्त मोहम्मद खान के परिवार के सदस्यों की संवेदनशीलता का फ़ायदा उठाया, उन्हें अपना इतिहास याद दिलाया, और उन्हें बिज्जेराम और मामोला जैसे ‘बाहरी हिन्दू द्वारा राज्य पर कब्ज़ा’ कर लेने जैसे तर्क से सहमत करने की कोशिश की।
इसी तरह के माहौल में 1762 में बिज्जेराम के निधन के बाद उनके मन में छिपी नफ़रत की भावना खुलकर सामने आ गयी। बिज्जेराम के बाद उनके बेटे घासीराम को दीवान बनाया गया। अपने पिता के विपरीत घासीराम एक कट्टर हिन्दू साबित हुए, उनकी वजह से मुस्लिम-हिन्दू तनाव को बल मिला। सत्ता संभालने के तुरंत बाद घासीराम की पठानों ने हत्या कर दी। उनके उत्तराधिकारी इज़्ज़त ख़ान को एक पठान की वेश्या ने जहर दे दिया और तीसरे मंत्री केसरी लाल की भी इसी तरह की हिंसक मौत हुई जब उनके घर को एक अफगान लड़की के साथ अवैध संबंध रखने के आरोप के बाद डायनामाइट से उड़ा दिया गया। इस प्रकार, कुछ ही समय में, तीन मंत्रियों की हिंसक मौतें हुईं।
भोपाल राज्य हिंसा के एक खतरनाक दौर में प्रवेश कर चुका था, आपसी नफ़रत की आग भीतर ही भीतर सुलगते हुए तनाव और अव्यवस्था पैदा करने लगी। अंततः, मामोला बाई ने प्रशासन को पूरी तरह से परिवार के पास रखते हुए फ़ैज़ के सबसे छोटे भाई यासीन को दीवान नियुक्त कर दिया।
1766 में मल्हारराव होलकर के निधन के बाद उनकी पुत्रवधू अहिल्या बाई होलकर इंदौर के सिंहासन पर बैठीं। इस तरह भोपाल और उसके पड़ोसी राज्य इंदौर दोनों ही स्थान पर एक समय में अपने-अपने बेटों के नाम पर महिलाएँ सत्ता संभाल रही थीं। अहिल्या बाई, मामोला बाई के प्रति सहानुभूति रखती थीं, इसलिए भोपाल को इंदौर से कोई खतरा नहीं था।
1775 तक मराठे काफी हद तक पानीपत में हुई क्षति से उबर चुके थे। ग्वालियर, इंदौर, बड़ौदा और नागपुर अलग अलग अपने बाहुबल का प्रदर्शन करने लगे। उन्होंने दिल्ली पर काबिज होने का इरादा छोड़ दिया और मालवा और दक्षिण पर अपना ध्यान केन्द्रित करने लगे। 1776 में पेशवा भारी-भरकम सेना के साथ भोपाल में दाखिल हुए। मामोला बाई ने फिर बुद्धिमानी का परिचय दिया और होशंगाबाद किले सहित पाँच सूबे देकर उन्हें शांत किया। पेशवा भोपाल से नज़राना, रसद और हाथी-घोड़े लेकर चले गये। दोस्त मोहम्मद के शासन काल के अंतिम वर्ष में शुरू हुआ मराठों का वर्चस्व इस समय जाकर समाप्त हुआ। भोपाल रियासत उस समय मुश्किल से अपने को संभाल पा रही थी।
46 की उम्र में संत स्वभाव के फ़ैज़ मोहम्मद खां 12 दिसंबर 1777 में एक बीमारी से चल बसे। इस दौरान राजधानी इस्लाम नगर से भोपाल स्थानांतरित हो गयी थी। उनकी कोई संतान नहीं थी। मामोला बाई ने चालीस दिन का मातम समाप्त होने से पहले ही फ़ैज़ के छोटे भाई हयात मोहम्मद खां को गद्दी पर बिठा दिया। उस समय मामोला बाई 60-62 की थीं जबकि हयात उस समय 43 साल के थे। वे एक कमज़ोर, मोटे और रंगीले स्वाभाव के शहज़ादे थे। मामोला बाई के इस निर्णय का फ़ैज़ मोहम्मद की विधवा सालेहा बेगम यानी बहू बेगम ने पुरज़ोर विरोध किया। उन्होंने दोस्त मोहम्मद खां के पुराने भरोसेमंद रिश्तेदारों की मदद से विद्रोह कर दिया।
बहू बेगम का जीवन करुणा, विश्वासघात और प्रतिशोध की एक असाधारण गाथा प्रस्तुत करता है। सालेहा उर्फ़ बहू बेगम - उस विश्वासघाती वासिल मोहम्मद ख़ान की पुत्री थी जिसने पेशवा के साथ मिलकर भोपाल पर आक्रमण करने और अपने भतीजे, फ़ैज़ मोहम्मद ख़ान से सिंहासन हथियाने का षड्यंत्र रचा था। पेशवा की सेना ने तत्पश्चात भोपाल पर आक्रमण किया, किन्तु मामोला बाई के संयमपूर्ण वार्ता की वजह से रियासत बच गयी। अंततः, वह मराठा सरदार को भोपाल का लगभग आधा भूभाग सौंपने के लिए सहमत हो गईं, जिसने मामोला और फ़ैज़ को एक भोपाल के सीमित क्षेत्र पर शासन करने की अनुमति दी गयी। इस संधि से, विश्वासघाती वासिल को कोई लाभ नहीं हुआ क्योंकि पेशवा ने उसे भोपाल की गद्दी पर आसीन करने से मना कर दिया। इस घटना के बाद से वासिल का सितारा गर्दिश में चला गया। घृणित साजिश की वजह से उसे हर तरफ से उपेक्षा मिली, उसकी आर्थिक स्थिति जर्जर हो गयी और वह चारों तरफ से संकट से घिर गया। इन्हीं दुखद परिस्थिति में उसकी मृत्यु हो गई। मामोला बाई को वासिल की विधवा, इज़्ज़त बेगम और आठ वर्षीय पुत्री सालेहा पर दया आई। वह दोनों को वापस भोपाल ले आईं, उनके गुजर बसर का प्रबंध किया और अपनी देखरेख में छोटी सालेहा का लालन-पालन किया। सालेहा जब बड़ी हुई तो उस का विवाह मामोला बाई ने युवा नवाब फ़ैज़ मोहम्मद ख़ान से करवा दिया, जिसके बाद वह बहू बेगम के नाम से जानी गईं।
वही बहू बेगम अब मामोला बाई से नफ़रत करती थी। उसने आरोप लगाया कि अपने कमज़ोर, आलसी अयोग्य बेटे को गद्दी पर बिठाकर मामोला बाई भोपाल में अपने हिंदू-राज को कायम रखना चाहती है। बहू बेगम ने अपने पति की मज़ार पर दरबार लगाना शुरू कर दिया और इस्लाम नगर में एक समानांतर सरकार स्थापित कर ली। तीन साल तक, उसने मामोला बाई के शासन के प्रति विद्रोह के रूप में नियमित रूप से दरबार लगाए। भोपाल के इतिहास में इस तरह का यह पहला उदाहरण है। अब भोपाल रियासत दो फाड़ हो चुकी थी। फतेहगढ़ से मामोला बाई, हयात मोहम्मद के नाम पर शासन कर रही थीं, जबकि इस्लामनगर किले से बहू बेगम दरबार चला रही थीं। वह अपने देवरों को ताने दे देकर उकसातीं। मामोला बाई ने बहू बेगम से यह आग्रह किया कि वे यार मोहम्मद के किसी भाई को नवाब बना दे और खुद उनकी अभिभावक बनकर शासन करें। इसके बाद स्वयं हयात मोहम्मद ने भोपाल में शांति स्थापित करने के लिए पद छोड़ देने की पेशकश कर दी।
उसी समय ईस्ट इण्डिया कंपनी का जनरल गोडार्ड हिन्दू-मुसलमानों को एक साथ रौंदता हुआ आया। भारी संख्या में अपने सैनिकों को लेकर वह कलकत्ते से बम्बई होते हुए 20 नवम्बर 1778 को वह भोपाल पहुँचा। पडोसी राज्यों से त्रस्त चतुर और दूरदर्शी मामोला बाई को गोडार्ड में उम्मीद की किरण नज़र आयी। वह बंगाल, अवध, बम्बई और दक्षिण में ब्रिटिश शक्ति के बढ़ते प्रभाव को जानती थीं। उन्हें लगा होगा कि शक्तिशाली अंग्रेजों से मिल जाने पर वे स्थानीय शत्रुओं से अपने राज्य को महफ़ूज़ रख सकती हैं। मामोला बाई ने गोडार्ड के लोगों का भोपाल में गर्मजोशी से स्वागत किया। उन्हें रायसेन किले में ठहराया गया, राशन दिया गया, शिष्टाचार बरता गया और लम्बी यात्रा से थके हुए सैन्य दल को हर तरीके से आराम देने की व्यवस्था की गयी। इस अप्रत्याशित आतिथ्य ने जनरल गोडार्ड के मन पर गहरी छाप छोड़ी जिसकी वजह से आगे चलकर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी से भी भोपाल राज्य को स्थायी संरक्षण प्राप्त हुआ।
गोडार्ड ने मामोला बाई के इस कदम की बहुत सराहना की और अपने वरिष्ठों को इस नाज़ुक मुस्लिम राज्य के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए रखने के महत्व से अवगत कराया, जो उन पड़ोसियों से घिरा हुआ था जो भारत के नियंत्रण में अँग्रेज़ों की राह में रोड़े अटका रहे थे।
यहाँ उल्लेखनीय है कि यार मोहम्मद खान की पत्नी बनने के कुछ ही समय बाद, मामोला बाई, जिन्हें भोपाल में माँजी साहिबा के नाम से जाना जाता था, ने चार हिंदू लड़कों को गोद लेने, धर्मांतरित करने और पालने का फ़ैसला किया था। वे नवाब के रिश्तेदारों में से किसी के बच्चे को गोद ले सकती थीं, लेकिन ऐसा नहीं करके उन्होंने हिन्दू बच्चों को गोद लिया। उनमें से पहला गोंड, दूसरा और तीसरा अहीर था। चौथा एक ब्राह्मण था जिसे छोटे ख़ान का नाम दिया गया। 1780 तक वह वयस्क हो गया था और माँजी साहिबा का ऋणी था। जल्दी-जल्दी तीन मंत्रियों की हिंसक मौतों के बाद, मामोला बाई ने अपना तुरुप का पत्ता खेलने का फैसला किया और 17 नवंबर 1780 को छोटे खान को रियासत का दीवान नियुक्त कर दिया।
छोटे ख़ान ने तुरंत भोपाल की बिगड़ती सामाजिक और प्रशासनिक स्थिति को अपने नियंत्रण में ले लिया। वह मजबूत इरादे वाला एक सक्षम प्रशासक साबित हुआ, जिसने प्रशासन को मजबूत करने और भीतर से असहमति को दबाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। मामोला बाई के लिए, छोटे ख़ान ने राज्य में वह स्थिरता प्रदान की जो बिज्जेराम की मृत्यु के बाद से नहीं रही थी।
छोटे ख़ान एक कुशाग्र बुद्धि वाले, चालाक और नीतिहीन राजनीतिक रणनीतिकार थे। कई स्थानों पर उन्हें क्रूर और नीतिहीन भी कहा गया है, अर्थात वे एक ऐसे व्यक्ति थे जो अपनी जीत के लिए किसी भी तरह का फैसला कर सकते थे और हिंसक भी हो सकते थे। उन्होंने सेना का पुनर्गठन किया और उसमें योग्य सैनिकों को भर्ती किया, जिसमें एक खुफिया विभाग भी शामिल था जो दीवान को खतरों और षड्यंत्रों से पूरी तरह अवगत रखता था। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में पुलिस अधिकारियों को तैनात किया और पड़ोसी राज्यों ग्वालियर, इंदौर और बड़ौदा में राजनयिक दूतों के प्रतिनिधियों को नियुक्त किया। छोटे खान ने व्यापारियों को सुविधाएं प्रदान करके भोपाल से व्यापार को प्रोत्साहित किया। उन्होंने सड़कें भी बनवाईं, भोपाल के उपनगरों का विस्तार किया और बाणगंगा नदी पर एक बांध बनवाया ताकि भोपाल के पास अपनी जलापूर्ति को बढ़ाने और अपनी रमणीयता को बढ़ाने के लिए एक और कृत्रिम झील हो। उन्होंने भोपाल से बहने वाली नदियों पर कई पुलों का निर्माण करवाया। छोटे ख़ान ने फतेहगढ़ किले को सुदृढ़ किया और यह सुनिश्चित किया कि भोपाल की मस्जिदों का उचित प्रबंधन हो। उन्होंने कवियों, लेखकों और धार्मिक विद्वानों को भोपाल में बसने के लिए प्रोत्साहित किया, ताकि भोपाल उत्तर में दिल्ली और दक्षिण में हैदराबाद के मुस्लिम सांस्कृतिक परिवेश को प्रतिबिंबित करने लगे। कुल मिलाकर, छोटे ख़ान के 14 वर्षों के शासनकाल में भोपाल ने विकास, स्थिरता और तृप्ति के एक नए युग में प्रवेश किया।
छोटे ख़ान के कठोर लेकिन प्रभावी शासन को बहू बेगम ने एक बड़ी चुनौती के रूप में देखा। उसने दोस्त मोहम्मद ख़ान के पोते शरीफ़ मोहम्मद ख़ान को ताना मारते हुए कहा, 'यदि मैं एक पुरुष होती, तो मैं इस ब्राह्मण दास को दोस्त मुहम्मद खान के परिवार पर शासन करने की अनुमति कभी नहीं देती।' इसके बाद उन्होंने मामोला -हयात-छोटे गठबंधन के विरुद्ध एक सेना खड़ी करने के लिए उन्हें धन देने का लालच दिया। शरीफ़ ने इस प्रस्ताव पर गंभीरता से काम करना आरंभ कर दिया। उसने अपने चचेरे भाइयों को अपनी तरफ मिला लिया, बर्रूकट पठान भी उसके साथ मिल गये और मामोला बाई-छोटे ख़ान द्वारा समर्थित 'हिन्दू राज' को उखाड़ फेंकने के लिए अन्य विद्रोही पठानों को भी एकत्रित किया। 5 हज़ार सैनिकों की एक सेना खड़ी करने के बाद, शरीफ़ ने बहू बेगम से वादे के अनुसार धन की मांग की। बहू बेगम यह मांग पूरी करने में विफल रहीं। शरीफ़ हताश होकर पीछे हट गया और युद्ध की स्थिति बनते-बनते रह गयी। इस विफलता के बाद बहू बेगम की वैकल्पिक सरकार का प्रभाव भी धीरे-धीरे कम होता चला गया।
छोटे ख़ान ने हयात के प्रतिद्वंद्वियों की ताकत को हमेशा के लिए ख़त्म करने के उद्देश्य से उनके खिलाफ़ आक्रामक तरीके से काम जारी रखा। विपक्ष का केंद्रबिंदु अब बहू बेगम से हटकर खुद शरीफ़ मोहम्मद खान बन गया था। शरीफ के सात भाई और एक बहादुर, सुंदर सा किशोर बेटा वज़ीर मोहम्मद ख़ान था। शरीफ़ ने हयात के मुख्य विपक्ष की बागडोर संभाली थी इसलिए उसे भोपाल से निर्वासित कर दिया गया। वह बगल के राजपूत इलाके में चला गया, जहां उसका स्वागत किया गया और भोपाल के विभाजन की कोशिश में इस शक्तिशाली सहयोगी का इस्तेमाल करने के उद्देश्य से उसे समर्थन दिया गया। शरीफ़ ने हयात की सेनाओं के साथ टकराव की तैयारी के लिए फिर से सेना खड़ी करनी शुरू कर दी।
24 फरवरी 1787 को फंदा नामक गाँव में दोनों पक्षों के बीच निर्णायक युद्ध हुआ। फंदा भोपाल से आठ मील पश्चिम में है। यह लड़ाई भोपाल के इतिहास की सबसे भयंकर लड़ाइयों में से एक थी। शरीफ़ ने अपने सात भाइयों के साथ अपनी सेना का नेतृत्व किया, जबकि अपने छोटे बेटे वज़ीर को पास के आष्टा गांव में परिवार की महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी दी गई थी। छोटे ख़ान को वफ़ादार पठान, कुछ राजपूत और सिख भाड़े के सैनिकों और भोपाल की नियमित सेना का समर्थन प्राप्त था। यह दोस्त के परिवार के सदस्यों के बीच सत्ता के लिए लड़ाई थी, यह अलग बात है कि भोपाल की सेना का नेतृत्व एक धर्मांतरित ब्राह्मण व्यक्ति कर रहा था जो अपनी दत्तक राजपूत माँ के प्रति वफ़ादार था। उस समय जबकि दोनों सेनाएँ फंदा में युद्ध के लिए तैयार आमने-सामने खड़ी थीं। भोपाल के नवाब हयात मोहम्मद खां अपने महल में आराम से बैठे रहे, जहाँ उनके नियमित परिचारक मुल्ले, ज्योतिषी, हिजड़े और वेश्याएँ उन्हें घेरे हुए थे।
फंदा की धरती तोपों की गड़गड़ाहट, सरपट दौड़ते घोड़ों की आवाज़, हमलावर हाथियों की तीखी तुरही, तलवारों और भालों की टकराहट से काँप उठी। यह एक खूनी, निर्दयी युद्ध था जिसमें शरीफ़ की विद्रोही सेनाएँ पराजित हुईं। अंत तक बहादुर और साहसी, शरीफ़ और उसके भाई अपनी ज़मीन पर डटे रहे और एक कामिल को छोड़कर बाकी सभी मारे गए। युद्ध इतना भयंकर था और दुश्मनी इतनी गहरी थी कि छोटे ख़ान की विजयी सेना ने छह भाइयों (सभी दोस्त मुहम्मद के पोते थे) के सिर काट दिए और उन्हें तलवारों पर लटकाकर हयात के महल में ले गए। छोटे ख़ान द्वारा खूनी अहंकार का प्रदर्शन हयात के लिए बहुत परेशान करने वाला था, न केवल इसलिए कि इस तरह के प्रदर्शन पारिवारिक परंपरा के खिलाफ थे, बल्कि इसलिए भी क्योंकि वे छोटे ख़ान के चरित्र में एक मतलबी, दुष्ट प्रवृत्ति की झलक भी देख रहे थे। राज्य पर पूर्ण नियंत्रण की धारणा, खासकर जब मामोला बाई अब बूढ़ी हो रही थी और सत्ता पर अपनी पकड़ खो रही थी, हयात और शरीफ़ के खिलाफ़ उनका समर्थन करने वाले वफादारों के लिए भी छोटे खां की यह नृशंसता चिंता का विषय थी। इसके बाद अचानक ही छोटे ख़ान की और कुछ समय बाद मामोला बाई की मौत हो गयी। उन्हें गिन्नौर गढ़ में दफनाया गया। इसके बाद भोपाल रियासत की राजनीति में तेजी से बदलाव हुआ लेकिन लोगों ने माँजी साहेबा को हमेशा याद रखा।
भोपाल के मुसलमानों में उनका इतना सम्मान था कि एक बार वे गंभीर रूप से बीमार पड़ीं और लम्बे समय तक बेहोशी की हालत में पड़ी रही। एक मुस्लिम संत, शाह अली शाह ने घोषणा की कि वह अल्लाह से अपने जीवन के दस साल कम करने और माँजी साहेबा को दे देने के लिए कहेंगे। यह बहुत कुछ वैसा ही था जैसा मरते हुए हुमायूँ के शरीर के चारों ओर घुमते हुए बाबर ने कहा था। संत ने भी मामोला बाई के स्वस्थ होने के लिए प्रार्थना करने के लिए एकांत में चले गए। प्रार्थना के सातवें दिन शाह अली शाह की मृत्यु हो गई और मामोला बाई ठीक होकर उठ बैठीं, हर जगह खुशी मनाई गई। आज भी बड़ी झील के बीचों बीच तकिया टापू पर, जहाँ शाह अली शाह को दफनाया गया था, उनके नाम का मज़ार है, यहाँ हर साल होने वाले उर्स में दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं।
सन्दर्भ स्रोत : यह विवरण आबिदा सुल्तान के पुत्र शहरयार खान द्वारा रचित पुस्तक बेगम्स ऑफ़ भोपाल ( ‘Begums of Bhopal’) में दर्ज जानकारी पर आधारित है
© मीडियाटिक



Comments
Leave A reply
Your email address will not be published. Required fields are marked *