ओडिशा उच्च न्यायालय ने महिलाओं के अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की दिशा में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि विवाह के मामलों में महिला की सहमति सर्वोपरि है।
माननीय न्यायालय ने कड़े शब्दों में कहा कि किसी भी बालिग महिला पर उसकी इच्छा के विरुद्ध विवाह थोपना न केवल उसके मौलिक अधिकारों का हनन है, बल्कि एक स्वस्थ समाज के लिए भी हानिकारक है।
अभिभावकों की मर्जी से ऊपर महिला की पसंद
मुख्य न्यायाधीश हरिश टंडन और न्यायमूर्ति मुरहरी श्री रमन की खंडपीठ ने 13 जनवरी, 2026 को एक बंदी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कॉर्पस) याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। यह मामला 21 वर्षीय एक युवती से जुड़ा था, जिसने परिजनों द्वारा जबरन कराए गए विवाह के बाद अपना ससुराल छोड़ दिया था। अदालत ने युवती को उसकी इच्छानुसार कहीं भी रहने की अनुमति देते हुए कहा कि माता-पिता या अभिभावकों के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि वे विवाह का निर्णय लेने से पहले अपनी बेटी की सहमति प्राप्त करें।
कोर्ट की तल्ख टिप्पणी
उच्च न्यायालय ने सामाजिक मानदंडों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि बाहरी दबाव या जबरदस्ती के माध्यम से किसी महिला को विवाह के लिए मजबूर करना एक प्रगतिशील समाज की नींव को कमजोर करता है। पीठ ने प्रशासन को निर्देश दिया कि अभिभावकों को जागरूक करने के लिए संवेदीकरण कार्यक्रम (सेंसिटाइजेशन प्रोग्राम्स) चलाए जाएं।
पुलिस को सुरक्षा के निर्देश
अदालत ने काकटपुर पुलिस स्टेशन के अधिकारियों को आदेश दिया है कि वे युवती को उसके द्वारा चुने गए स्थान पर सुरक्षित पहुंचाने की व्यवस्था करें। साथ ही, पुलिस को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया है कि युवती के माता-पिता या उसके तथाकथित पति द्वारा उसकी स्वतंत्रता में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप न किया जाए।



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