सुप्रीम कोर्ट : गृहिणी का काम कमाने वाले जीवनसाथी से कम नहीं

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सुप्रीम कोर्ट : गृहिणी का काम कमाने वाले जीवनसाथी से कम नहीं

गृहिणी के काम को नौकरी करने वालों के बराबर नहीं माना जाता है। आज के खर्चीले दौरे में यह धारणा बढ़ रही है कि पत्नी कमाने वाली हो तो ज्यादा ठीक है। सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए एक बड़ी टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा, गृहिणी का काम नौकरी कर वेतन लाने वाले साथी से कम नहीं होता है। कोर्ट ने कहा कि घर की देखभाल करने वाली महिला की भूमिका उच्च स्तर की है जिसके योगदान को पैसे में नापना कठिन है।

अदालत पहुंचा केस

जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने करीब 17 साल पहले सड़क दुर्घटना में एक महिला की मौत से जुड़े मोटर दुर्घटना दावे की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि ट्रिब्युनलों और अदालतों को मोटर दुर्घटना दावों के मामलों में गृहणियों की अनुमानित आय की गणना उनके काम, श्रम और त्याग के आधार पर करनी चाहिए। मोटर दुर्घटना दावा ट्रिब्युनल ने महिला के पति और नाबालिग बेटे को ढाई लाख का हर्जाना दिया जाने का आदेश दिया। अपील करने पर हाई कोर्ट ने ट्रिब्युनल के आदेश में कोई गलती नहीं मानी जिसमें गृहिणी होने के आधार पर दावे की गणना में महिला की अनुमानित आय को एक दैनिक मजदूर से भी कम माना गया था। सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए मुआवजे को बढ़ाकर छह लाख रुपए कर दिया और इसे छह सप्ताह के भीतर मृतका के परिवार को भुगतान करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि परिवार में एक गृहिणी की भूमिका ठोस आय वाले सदस्य जितनी ही महत्वपूर्ण है। यदि एक गृहिणी के काम की एक-एक करके गणना की जाए, तो नि:संदेह उसका योगदान अमूल्य निकलेगा।

हाई कोर्ट को फटकार

सुप्रीम कोर्ट ने गृहिणी की अनुमानित आया एक दैनिक मजदूर से भी कम मानने के हाई कोर्ट के रुख को खारिज कर दिया। कोर्ट ने ऐसा दृष्टिकोण अपनाने के लिए हाई कोर्ट को फटकार लगाई। कोर्ट ने कहा कि एक गृहिणी की आय को एक दिहाड़ी मजदूर से कम कैसे माना जा सकता है? हम इस तरह के दृष्टिकोण को स्वीकार नहीं करते। किसी को गृहिणी के कामकाज के मूल्य को कभी कम नहीं आंकना चाहिए। शीर्ष अदालत ने फैसले में कई तथ्यात्मक त्रुटियों के लिए भी हाई कोर्ट की आलोचना की।

 ये है मामला

दरअसल, 2006 में एक सड़क हादसे में उत्तराखंड की एक महिला की मौत हो गई थी। वह महिला जिस गाड़ी में यात्रा कर रही थी, उसका बीमा नहीं था। परिजनों ने बीमा का दावा किया तो ट्रिब्यूनल ने महिला के परिवार (पति और नाबालिग बेटे) को 2.5 लाख रुपए की क्षतिपूर्ति देने का फैसला दिया। महिला को मिलने वाली बीमा राशि को ट्रिब्यूनल ने कम आंका था। परिवार ने अधिक मुआवजे के लिए ट्रिब्यूनल के इस फैसले को उत्तराखंड हाई कोर्ट में चुनौती दी। हालांकि हाई कोर्ट ने इस याचिका खारिज कर दिया। हाई कोर्ट ने ट्रिब्युनल के फैसले को सही ठहराते हुए कहा था, महिला गृहिणी थी, इसलिए मुआवजा जीवन प्रत्याशा और न्यूनतम अनुमानित आय पर तय किया गया था। ट्रिब्यूनल ने अपने फैसले में उस महिला की अनुमानित आय दिहाड़ी मजदूर से भी कम माना था।

 

सन्दर्भ स्रोत : पत्रिका 

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