उम्र के उस पड़ाव पर, जब लोगों को सहारे की जरूरत होती है, तब इंदौर की 65 वर्षीय राधाबाई ने अपने पति और बेटे को खोने के बाद हार मानने के बजाय जिंदगी से लड़ना चुना। आज राधाबाई मोची का काम करके सम्मान के साथ अपना जीवन-यापन कर रही हैं और समाज के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं।
9 साल से चला रही हैं मोची की दुकान
राधाबाई के पति की अचानक दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई थी। पति के जाने के बाद उन्हें अपने बेटे से सहारे की उम्मीद थी, लेकिन पारिवारिक परेशानियों से दुखी होकर बेटे ने भी आत्महत्या कर ली।
परिवार पर दुखों का पहाड़ टूटने के बाद राधाबाई ने दूसरों के सामने हाथ फैलाने के बजाय अपने पति का काम संभालने का फैसला किया। उन्होंने कभी औपचारिक रूप से जूते रिपेयर, पॉलिश या सिलाई का काम नहीं सीखा था, लेकिन पति को काम करते हुए देखकर उन्होंने यह हुनर सीख लिया।
आज वह रोजाना अपनी छोटी सी दुकान पर बैठकर जूते ठीक करती हैं और करीब 100 से 150 रुपये तक की कमाई कर लेती हैं।
चुना आत्मसम्मान का रास्ता
राधाबाई की पांच बेटियां हैं और सभी की शादी हो चुकी है। चाहतीं तो वह बेटियों के साथ रह सकती थीं, लेकिन उन्होंने आत्मसम्मान के साथ खुद मेहनत करके जीने का रास्ता चुना।
राधाबाई मानती हैं कि मेहनत का कोई काम छोटा नहीं होता। उनका कहना है कि चोरी करना गलत है, लेकिन मेहनत-मजदूरी करके कमाना गर्व की बात है।
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ग्राहकों से नहीं करती बहस
राधाबाई बताती हैं कि जो ग्राहक जितने पैसे दे देता है, वह उतने में ही संतुष्ट हो जाती हैं। वह ग्राहकों से कभी बहस नहीं करतीं। उनका कहना है कि आजकल बुजुर्गों को अक्सर बोझ समझ लिया जाता है, लेकिन अगर इंसान आत्मनिर्भर हो और अपनी जरूरतें खुद पूरी कर सके, तो इससे बड़ा सुख कोई नहीं होता।
दुकान पर कब्जे का रहता है डर
राधाबाई रोजाना अपनी दुकान इसलिए भी खोलती हैं क्योंकि उन्हें डर रहता है कि कहीं उनकी गैरमौजूदगी में कोई दुकान पर कब्जा न कर ले या प्रशासन उसे अतिक्रमण मानकर हटा न दे।
पति और बेटे के न होने के कारण वह अपनी दुकान को बचाए रखने के लिए हर दिन लंबी दूरी तय कर दुकान खोलने पहुंचती हैं।



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