हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा कि केवल बिना ठोस और वैध प्रमाण के लगाए गए पहले विवाह के आरोप किसी पत्नी को घरेलू हिंसा कानून के तहत राहत और भरण-पोषण के अधिकार से वंचित नहीं कर सकते। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि विवाह स्वीकार किया गया है और पहले विवाह का कोई कानूनी प्रमाण रिकॉर्ड में मौजूद नहीं है, तो पत्नी को राहत देने से इनकार नहीं किया जा सकता।
यह फैसला जस्टिस संदीप शर्मा की बेंच ने सुनाया।
मामला क्या था?
मामले में पत्नी ने घरेलू हिंसा अधिनियम (Domestic Violence Act) के तहत शिकायत दर्ज कर पति और ससुराल पक्ष पर उत्पीड़न, दहेज प्रताड़ना और आर्थिक उपेक्षा के आरोप लगाए थे। उसने भरण-पोषण की भी मांग की थी।
ट्रायल कोर्ट ने यह कहते हुए शिकायत खारिज कर दी थी कि महिला का पहले से विवाह था और वह विवाह समाप्त हुए बिना दूसरा विवाह किया गया था।
हालांकि, सेशन कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला पलटते हुए पत्नी को ₹10,000 मासिक भरण-पोषण और ₹5,000 किराया भत्ता देने का आदेश दिया था।
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हाईकोर्ट का फैसला
पति ने इस आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। हाईकोर्ट ने सुनवाई के बाद कहा कि जब विवाह को लेकर कोई कानूनी विवाद सिद्ध नहीं होता, तो पत्नी को भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता।
अदालत ने यह भी पाया कि पत्नी ने शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न तथा दहेज प्रताड़ना के आरोप लगाए हैं और रिकॉर्ड में यह साबित नहीं हुआ कि उसके पास कोई स्वतंत्र आय का स्रोत है।
हाईकोर्ट ने कहा कि पति का कानूनी दायित्व है कि वह पत्नी को आर्थिक सहायता और जीवन-यापन के लिए पर्याप्त भरण-पोषण प्रदान करे।
इन तथ्यों के आधार पर हाईकोर्ट ने पति की याचिका खारिज कर दी और सेशन कोर्ट का आदेश बरकरार रखा।



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