चंडीगढ़। Punjab and Haryana High Court ने नाबालिग बच्चे की कस्टडी से जुड़े एक अहम मामले में स्पष्ट किया है कि माता-पिता की शैक्षणिक योग्यता से ज्यादा महत्वपूर्ण बच्चे का सर्वोत्तम हित होता है। अदालत ने पिता की अपील को खारिज करते हुए मां के पास कस्टडी बनाए रखने के फैसले को बरकरार रखा।
क्या था पूरा मामला
यह मामला पंजाब के मुक्तसर साहिब की फैमिली कोर्ट के आदेश से जुड़ा है, जिसमें 15 जनवरी 2026 को बच्चे की कस्टडी मां को दी गई थी। इस आदेश को चुनौती देते हुए पिता, जो पेशे से डॉक्टर हैं, ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। पिता का तर्क था कि वे अधिक शिक्षित और सक्षम हैं, इसलिए बच्चे की कस्टडी उन्हें मिलनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि बच्चे की पढ़ाई प्रभावित हो रही है और मुलाकात (विजिटेशन) के लिए निश्चित समय तय नहीं किया गया।
कोर्ट की अहम टिप्पणी - जस्टिस हरसिमरन सिंह सेठी की एकल पीठ ने सभी तथ्यों पर विचार करते हुए कहा कि बच्चे की कस्टडी पिछले 6 वर्षों से मां के पास है। उसकी देखभाल में किसी तरह की लापरवाही का कोई ठोस सबूत नहीं है, केवल शिक्षा के आधार पर किसी को बेहतर अभिभावक नहीं माना जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि भारतीय समाज में कई उदाहरण हैं, जहां कम शिक्षित माताएं भी अपने बच्चों का सफल पालन-पोषण करती हैं।
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आपराधिक मामले पर कोर्ट का रुख
पिता ने 2019 में मां के खिलाफ दर्ज एक आपराधिक मामले का भी हवाला दिया, लेकिन अदालत ने इसे खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि मामला मामूली था। मां को प्रोबेशन पर रिहा किया गया था।उसके बाद उसके व्यवहार पर कोई सवाल नहीं उठा। इस आधार पर मां को अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता।
मां को क्यों माना गया बेहतर
सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि पिता को नौकरी के कारण लंबे समय तक घर से बाहर रहना पड़ता है। उनके साथ रहने वाले बुजुर्ग माता-पिता भी अस्वस्थ हैं वहीं, मां लगातार बच्चे के साथ रहकर उसकी देखभाल कर रही है। अदालत ने इसे बच्चे के हित में अधिक उपयुक्त माना।
पढ़ाई को लेकर पिता के आरोप खारिज
बच्चे की पढ़ाई प्रभावित होने के आरोप पर कोर्ट ने कहा कि फीस न भरने के कारण स्कूल उपस्थिति प्रभावित हुई, जिसमें पिता की भी जिम्मेदारी बनती है। इसलिए इस आधार पर मां की अभिभावकता पर सवाल नहीं उठाया जा सकता।
विजिटेशन राइट्स पर क्या कहा
अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि मुलाकात के समय को लेकर कोई अस्पष्टता है, तो पिता फैमिली कोर्ट में आवेदन देकर स्पष्टीकरण ले सकते हैं। इसे कस्टडी आदेश रद्द करने का आधार नहीं बनाया जा सकता।
Punjab and Haryana High Court के इस फैसले ने साफ कर दिया है कि बच्चे की कस्टडी तय करते समय सबसे अहम मानदंड बच्चे का हित और उसकी भलाई है, न कि माता-पिता की डिग्री या पेशा। यह निर्णय पारिवारिक कानून में एक महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है, जो यह दर्शाता है कि अदालतें बच्चों के भविष्य और सुरक्षा को सर्वोपरि मानती हैं।



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