इलाहाबाद हाईकोर्ट : गुजारा भत्ता से बचने के

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इलाहाबाद हाईकोर्ट : गुजारा भत्ता से बचने के
लिए ‘साथ रहने’ का बहाना नहीं चलेगा

Allahabad High Court ने गुजारा भत्ता (Maintenance) से जुड़े एक अहम मामले में स्पष्ट किया कि पति केवल पत्नी को साथ रखने की औपचारिक बात कहकर अपनी कानूनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता। अदालत ने कहा कि ऐसी पेशकश के पीछे वास्तविक नीयत और उसे निभाने की ठोस कोशिश दिखाई देनी चाहिए।

न्यायमूर्ति Justice Garima Prasad की एकल पीठ ने पति की पुनरीक्षण याचिका (Revision Plea) खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा। निचली अदालत ने पति को पत्नी को 5,000 रुपये और नाबालिग बेटी को 2,000 रुपये प्रतिमाह देने का निर्देश दिया था।

यह मामला 2012 में मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत हुए विवाह से जुड़ा है। पत्नी ने आरोप लगाया कि उसे दहेज प्रताड़ना का सामना करना पड़ा और बाद में उसे तथा उसकी बेटी को घर से निकाल दिया गया। आय का कोई साधन न होने पर उसने अदालत से भरण-पोषण की मांग की।

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हाईकोर्ट में पति ने दावा किया कि उसकी पत्नी बिना कारण अलग रह रही है और वह उसे अपने साथ रखने को तैयार है। उसने खुद को एक मामूली स्टेबलाइजर मैकेनिक बताते हुए अपनी आय केवल 250 रुपये प्रतिदिन बताई। साथ ही पत्नी पर ब्यूटी पार्लर और ट्यूशन से 50,000 रुपये प्रतिमाह कमाने का आरोप लगाया।

अदालत ने पति के इन दावों को बिना प्रमाण का बताया। कोर्ट ने कहा कि पति अपनी कम आय या पत्नी की कथित अधिक कमाई का कोई सबूत पेश नहीं कर सका। वहीं पत्नी ने नगर निगम टैक्स रिकॉर्ड और सेल डीड जैसे दस्तावेज दाखिल किए, जिनसे पता चला कि पति का परिवार बड़े इलेक्ट्रॉनिक्स कारोबार से जुड़ा है।

कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल आरोप लगाने से भरण-पोषण का दावा खारिज नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब पति अपनी वास्तविक आर्थिक स्थिति छिपाने की कोशिश कर रहा हो।

सुनवाई के दौरान पति ने मध्यस्थता (Mediation) की इच्छा जताई, लेकिन इसके लिए जरूरी प्रक्रिया शुल्क तक जमा नहीं किया। अदालत ने इसे इस बात का संकेत माना कि पत्नी को साथ रखने की पेशकश केवल गुजारा भत्ता रोकने की रणनीति थी, न कि वैवाहिक जिम्मेदारियां निभाने की सच्ची कोशिश।

कोर्ट ने दोहराया कि Section 125 CrPC सामाजिक न्याय का प्रावधान है, जिसका उद्देश्य महिलाओं और बच्चों को आर्थिक असुरक्षा और भुखमरी से बचाना है।

अंत में हाईकोर्ट ने कहा कि आज की महंगाई और शिक्षा खर्च को देखते हुए कुल 7,000 रुपये प्रतिमाह की राशि भी बहुत मामूली है। इसलिए फैमिली कोर्ट के आदेश में किसी हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है और पति की याचिका खारिज की जाती है।

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