सुप्रीम कोर्ट ने शादी के झूठे वादे पर दर्ज रेप के एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए आरोपी के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी। अदालत ने कहा कि यह रिश्ता कई वर्षों तक आपसी सहमति से चला और इसे केवल ‘झूठे शादी के वादे’ के आधार पर अपराध नहीं माना जा सकता।
जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें आरोपी की याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी गई थी कि उसने पहले भी इसी मामले में याचिका दायर कर वापस ले ली थी।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि दोनों पक्ष पहले से ही शादीशुदा थे और इस तथ्य से पूरी तरह परिचित थे। अदालत ने यह भी नोट किया कि महिला ने तलाक अंतिम रूप लेने से पहले ही दूसरी शादी के लिए मैट्रिमोनियल वेबसाइट पर प्रोफाइल बनाई थी।
कोर्ट ने कहा:
“दोनों पक्ष 2017 से 2020 तक खुशी-खुशी साथ रहे। इस दौरान महिला ने कभी जबरदस्ती या दबाव का आरोप नहीं लगाया। बाद में रिश्ते में खटास आने के बाद शिकायत दर्ज कराई गई। यह ऐसा मामला नहीं है, जिसमें शादी के झूठे वादे के जरिए धोखा दिया गया हो।”
मामला क्या था?
शिकायतकर्ता महिला की शादी 1998 में हुई थी और वह 2012 से अपने पति से अलग रह रही थी। तलाक की प्रक्रिया पूरी होने से पहले उसने दूसरी शादी के लिए एक मैट्रिमोनियल वेबसाइट पर प्रोफाइल बनाई।
इसी प्लेटफॉर्म के जरिए आरोपी से उसकी पहचान हुई। महिला का आरोप था कि आरोपी ने शादी का वादा किया और अक्टूबर 2017 में उससे मिलने आया। महिला ने आरोप लगाया कि आरोपी ने उसकी इच्छा के विरुद्ध शारीरिक संबंध बनाए, जिसमें अप्राकृतिक संबंध भी शामिल थे।
हालांकि, रिकॉर्ड के अनुसार दोनों कई वर्षों तक संपर्क में रहे, साथ घूमने गए, होटलों में ठहरे और उनके बीच लगातार शारीरिक संबंध बने रहे।
महिला ने फरवरी 2021 में शिकायत दर्ज कराई, जब आरोपी ने कथित तौर पर शादी से इनकार कर दिया।
हाईकोर्ट ने क्यों खारिज की थी याचिका?
आरोपी ने बॉम्बे हाईकोर्ट में केस रद्द करने की मांग की थी। हाईकोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि आरोपी पहले भी ऐसी याचिका दायर कर चुका है और अब मामले की सुनवाई ट्रायल कोर्ट में होनी चाहिए।
लेकिन सुप्रीम Court ने कहा कि पिछली याचिका बिना किसी कानूनी चर्चा के वापस ली गई थी। इसलिए केवल ‘सुनवाई योग्य नहीं’ कहकर याचिका खारिज करना उचित नहीं था।
FIR दर्ज कराने में देरी पर भी कोर्ट की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि कथित घटना अक्टूबर 2017 की थी, जबकि FIR फरवरी 2021 में दर्ज कराई गई। इस दौरान दोनों पक्षों के बीच लगातार संपर्क और संबंध बने रहे।
अदालत ने माना कि यह मामला ‘झूठे वादे के आधार पर धोखे’ की श्रेणी में नहीं आता।
पुराने फैसले का दिया हवाला
सुप्रीम कोर्ट ने अपने पूर्व फैसले महेश दामू खरे बनाम महाराष्ट्र राज्य का हवाला देते हुए कहा कि:
‘शादी का झूठा वादा और बाद में परिस्थितियों के कारण शादी न हो पाना’ दोनों में अंतर करना जरूरी है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आपराधिक मामला तभी बनता है जब शुरुआत से ही शादी का कोई वास्तविक इरादा न हो और उसी झूठे वादे के कारण संबंध बनाए गए हों।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला
सभी तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी के खिलाफ IPC की धारा 376(2)(n), 377 और 506 के तहत चल रही कार्यवाही रद्द कर दी।
अदालत ने कहा कि यह मामला लंबे समय तक चले आपसी सहमति वाले रिश्ते का था, जो बाद में खराब हो गया। इसे ‘शादी के झूठे वादे पर रेप’ का मामला नहीं माना जा सकता।



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