राजस्थान हाईकोर्ट ने आरटीआई कानून और निजता के अधिकार को लेकर एक अहम फैसला दिया है, जिसमें पत्नी को पति की सैलरी डिटेल देने से इनकार को सही ठहराया गया है। कोर्ट ने कहा कि नौकरी और वेतन से जुड़ी जानकारी निजी सूचना है और इसे बिना बड़े जनहित के सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। यह मामला स्मृति कांता कुमावत और ओमप्रकाश कुमावत से जुड़ा है, जो राजस्थान पुलिस विभाग में कार्यरत हैं। पत्नी ने सूचना का अधिकार कानून के तहत पति की जनवरी से मार्च 2024 तक की सैलरी स्लिप और वेतन विवरण मांगा था। विभाग ने इसे तीसरे पक्ष की निजी जानकारी बताते हुए देने से इनकार कर दिया था, जिसके खिलाफ हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की गई।
जोधपुर पीठ में न्यायमूर्ति कुलदीप माथुर ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि सैलरी, सर्विस रिकॉर्ड, प्रदर्शन और नौकरी से जुड़ी जानकारी कर्मचारी और नियोक्ता के बीच का निजी मामला है। आरटीआई एक्ट की धारा 8(1)(j) के तहत ऐसी निजी जानकारी को सार्वजनिक नहीं किया जा सकता, जब तक कि इसमें कोई बड़ा जनहित शामिल न हो, कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले गिरीश रामचंद्र देशपांडे मामले का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि सरकारी कर्मचारी की सर्विस जानकारी निजी सूचना है और इसे बिना जनहित के उजागर नहीं किया जा सकता।
पत्नी को कब मिल सकती है आय की जानकारी
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि आरटीआई के तहत पत्नी पति की आय की जानकारी नहीं मांग सकती, लेकिन अगर मेंटेनेंस, तलाक या घरेलू हिंसा से जुड़े मामले अदालत में चल रहे हैं, तो फैमिली कोर्ट पति और पत्नी दोनों को अपनी आय और संपत्ति का खुलासा करने का आदेश दे सकता है। मेंटेनेंस तय करने के लिए अदालतें अक्सर दोनों पक्षों से आय, खर्च और संपत्ति का हलफनामा दाखिल करने को कहती हैं। ऐसे मामलों में पति की सैलरी और आय की जानकारी कानूनी प्रक्रिया के तहत मिल सकती है।
निजता बनाम पारदर्शिता की बहस
यह फैसला निजता के अधिकार को मजबूत करता है और यह स्पष्ट करता है कि आरटीआई कानून पारदर्शिता के लिए है, लेकिन निजी जीवन में अनावश्यक दखल देने के लिए नहीं। कोर्ट का मानना है कि बिना बड़े जनहित के किसी व्यक्ति की निजी आर्थिक जानकारी सार्वजनिक करना निजता का उल्लंघन होगा।



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