डॉ. सविता इनामदार

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डॉ. सविता इनामदार

छाया : स्व संप्रेषित

शिशु रोग विशेषज्ञ और राज्य महिला आयोग, मप्र की पूर्व अध्यक्षा डॉ. सविता इनामदार चिकित्सा एवं समाज सेवा के क्षेत्र में देश भर में जानी जाती रहीं। उनका जन्म 5 अक्टूबर 1938 को बिलासपुर में एक सुशिक्षित परिवार में हुआ। उनके गांधीवादी पिता श्री शिवशंकर सहाय ज़मींदार थे। आज़ादी के बाद जब ज़मींदारी प्रथा समाप्त हो गई तो वे खेती – किसानी करने लगे, साथ ही वे नेशनल हेराल्ड समाचार पत्र में उपसंपादक भी थे। उन्होंने जीवनपर्यंत गांधीजी के विचारों को अपने कार्य-व्यवहार में उतारने का प्रयत्न किया। सविता जी की माता जी उस समय की मिशनरी स्कूल से आठवीं कक्षा तक शिक्षित थीं। विभिन्न सामाजिक मुद्दों पर प्रायः वे अपने पति से चर्चा करती रहती थीं। इस वातावरण ने सविता जी सहित उनके अन्य सात भाई – बहनों के बौद्धिक विकास में अहम भूमिका निभाई।

सविता जी की प्रारंभिक शिक्षा मुंगेली में हुई। वर्ष 1953 में शासकीय उच्च विद्यालय से हायर सेकेंडरी करने के बाद लखनऊ से उन्होंने से 1955 में एफएससी किया। पुनः मेडिकल हेतु प्रवेश परीक्षा में सफल होने के बाद जबलपुर मेडिकल कॉलेज में उन्होंने नामांकन करवाया परन्तु कॉलेज के पास अपना भवन न होने के कारण छात्रों को नागपुर स्थानांतरित कर दिया गया। लगभग छ: माह वहाँ रहने के बाद पुनः जबलपुर मेडिकल कॉलेज में वापसी हुई। परन्तु दो वर्ष गुजारने के बाद वे इंदौर मेडिकल कॉलेज आ गईं। 1960 में एमबीबीएस पास करने के बाद उन्होंने डीसीएच एवं तदुपरांत एमडी की डिग्री हासिल की। वर्ष 1965 में सविता जी ने अपने सहपाठी श्री विजयकुमार ईनामदार से विवाह कर लिया जिसे परिवार ने सहर्ष स्वीकार किया। पिता खुले विचारों के थे, इसलिए बेटियों पर अपनी इच्छाएं थोपने का प्रयास उन्होंने कभी नहीं किया।

पढ़ाई ख़त्म होने पर सविता जी  इंदौर मेडिकल कॉलेज में ही सहायक व्याख्याता के पद पर नियुक्त हो गईं और कुछ समय बाद उन्हें पदोन्नति भी मिल गई। नए पद पर काम करते हुए थोड़ा ही समय बीता था कि उन्हें डाउन स्ट्रीट मेडिकल सेंटर स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ़ न्यूयार्क से फ़ेलोशिप मिल गई और वे अमेरिका चली गईं, जहां 1972 तक रहकर उन्होंने पीडियाट्रिक्स एवं पीडियाट्रिक्स एंडोक्रेनोलॉजी में विशेष योग्यता प्राप्त की। स्वदेश आने पर उन्होंने देखा कि उनकी जगह एक कनिष्ठ लेकिन रसूखदार व्यक्ति को नियुक्त कर दिया गया है। उस समय पचास प्रतिशत पदोन्नतियां विभाग के माध्यम से और शेष लोक सेवा आयोग के माध्यम से हुआ करती थीं। सविता जी ने लोक सेवा आयोग के रास्ते कोशिश की, लेकिन कामयाब नहीं हो सकीं। उनके लिए यह सब आत्मसम्मान पर असहनीय प्रहार सिद्ध हुआ और वे सविता जी लम्बे अवकाश पर चली गईं। उसी दौरान उनकी छोटी बिटिया ने जन्म लिया।

करियर को लेकर अनिश्चितता के साथ घोर मानसिक संताप भी वे उस समय झेल रही थीं। मेडिकल कॉलेज में व्याख्याता बनना उनका सपना था जो अब बिखरता सा नज़र आ रहा था। एक आख़िरी कोशिश के तहत वे स्वास्थ्य मंत्री से मिलीं, जिन्होंने उन्हें भोपाल के गांधी मेडिकल कॉलेज में अस्थायी रूप से काम करने का प्रस्ताव दिया क्योंकि वहां एक पद खाली था। जब तक उसका दावेदार न पहुंचे, तब तक वे वहां काम कर सकती थीं। कोई और विकल्प न देखकर उन्होंने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। वे हर हफ़्ते छोटी बिटिया को लेकर वे भोपाल से इंदौर के बीच आना जाना करतीं। यह सिलसिला लगभग एक साल चला। फिर उस पद पर दूसरे व्यक्ति के आने पर गांधी मेडिकल कॉलेज से उन्हें जाना पड़ा। उनकी ज़िंदगी फिर वहीं आकर खड़ी हो गई जहाँ से वह शुरू हुई थी।

सविता जी के पास अब दो ही विकल्प थे – या तो आत्मसम्मान से समझौता करते हुए वे कनिष्ठ पद स्वीकार कर लें या नौकरी छोड़कर अपने आत्मसम्मान की रक्षा करें। उन्होंने दूसरा विकल्प चुना और महीनों के बाद उस रात अच्छी नींद सोयीं। यह खुद के साथ इंसाफ़ करने का राहत भरा अहसास था। कुछ दिनों के बाद वे अलग-अलग अस्पतालों के साथ जुड़कर कंसल्टेंसी का काम करने लगी। इसके बाद दो घंटे घर से भी मरीजों को देखती। वक़्त ने उन्हें समझाया कि नौकरी छोड़ देने का निर्णय बिलकुल सही था। धीरे-धीरे अनुभव एवं अभ्यास से अर्जित ज्ञान का लोहा सभी मानने लगे और योग्य चिकित्सक के रूप में सविता जी की ख्याति फैलने लगी। 1980 के दशक में वे चोइथराम अस्पताल एवं अनुसंधान केंद्र के शिशु रोग विभाग की मानद विभागाध्यक्ष बन गईं।

वे बाल रोग विशेषज्ञ थीं तो स्वाभाविक रूप से मांओं से भी उनका संपर्क होता था। उन्होंने पाया कि बच्चों में स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्या के मूल में एक मात्र कारण गरीबी नहीं बल्कि जागरूकता का अभाव है। यदि माताओं में समझ हो तो अल्प साधन में भी वे पोषण की उचित व्यवस्था कर सकती हैं। चिंतन और विश्लेषण से यह बात भी उनके समझ में आई कि स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्या मात्र मेडिकल का मुद्दा नहीं बल्कि इसके तार काफी हद तक सामाजिक एवं सांस्कृतिक पहलुओं से भी जुड़े हैं। इस आत्म चिंतन और अन्तःप्रेरणा से उन्होंने वामा क्लब का गठन किया। यह विधिवत पंजीकृत संस्था नहीं है फिर भी इससे महिला चिकित्सक और समाज सेवा की इच्छुक महिलाएं जुड़ती चली गईं। वर्ष 1979 के आसपास उन्होंने रोग निरोधक स्वास्थ्य संरक्षक समिति का गठन किया। जिसके माध्यम से महिलाओं के बीच जाकर जागरूकता प्रसार का कार्य करने लगीं। इस तरह एक चिकित्सक के रूप में उन्होंने अपनी भूमिका को स्वयं विस्तार दिया और समाजसेवा से जुड़ गईं।

वर्ष 1998 में  इंदौर में आयोजित एक कार्यक्रम में राष्ट्रीय महिला आयोग की तत्कालीन अध्यक्षा मोहिनी गिरी की मुलाकात सविता जी से हुई। वे उनकी बातचीत और कामकाज से बहुत प्रभावित हुईं। उन्होंने मप्र सरकार से को राज्य महिला आयोग की सदस्यता के लिए सविता जी के नाम की अनुशंसा की जिसे स्वीकार कर लिया गया। इस नए दायित्व के साथ महिला मुद्दों पर सविता जी का नज़रिया और साफ़ हुआ। वर्ष 2001 में वे आयोग की अध्यक्ष बन गईं और 2005 तक इस पद पर रहते हुए उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। इसके बाद वे महिला चेतना, वामा, इंडियन एकेडमी ऑफ़ पीडियाट्रिक्स, मेनोपॉज सोसायटी, लायंस और रोटरी क्लब जैसी विभिन्न संस्थाओं के साथ जुड़कर महिलाओं एवं बच्चों के हित में कार्य करती रहीं।

डॉ. सविता इनामदार के 40 से अधिक शोधपत्र प्रकाशित हुए जिनमें से 8 तो अंतरराष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित हुए हैं। स्वास्थ्य विषयों पर इनके द्वारा लिखे गए लेख अनेक पाठ्य पुस्तकों में सम्मिलित किये गए हैं। ‘बाल्यावस्था में यक्ष्मा’ शिशु देखभाल, पोषण, एआईआर, डायरिया और थैलेसीमिया जैसे विषयों पर उनकी 4 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। इसके अलावा रिसेन्ट एडवांसेस इन पीडियाट्रिक्स, स्टोरी ऑफ़ एमजीएम, हेल्थ केयर ऑफ़ फीमेल एडोलसेंट, रेप विक्टिम एंड सपोर्ट सिस्टम, सेक्यूलारिज्म एंड वीमेन उनकी प्रमुख प्रकाशित कृतियाँ हैं। इस बीच अपनी चिकित्सकीय विशेषज्ञता पर आधारित अनेक कांफ्रेंस आदि का आयोजन करवाने के साथ विभिन्न विभिन्न संस्थाओं के कई महत्वपूर्ण पदों पर रहते हुए अपने सामाजिक दायित्वों का भी निर्वहन किया।

अपने कार्य क्षेत्र को एक अलग ही आयाम देते हुए सविता जी ने आदि फ़िल्म्स के नाम से अपने प्रोडक्शन हाउस की शुरुआत की, जिसमें सामाजिक एवं स्वास्थ्य विषयों पर आधारित टेलीफ़िल्मों का निर्माण किया जाता था। इसके अंतर्गत उन्होंने 11 फिल्में बनाईं जिनमें से आरम्भ (थेलेसिमिया पर आधारित) चैम्पियन (अस्थमा पर आधारित) दृष्टि (नेत्र रोग पर आधारित), श्रद्धांजलि (स्व. डॉ. एस.के. मुखर्जी के जीवन पर आधारित), विवेक तो यही है (एड्स पर आधारित) फ़िल्में दूरदर्शन पर प्रसारित हुईं। इसके अलावा समझदार (परिवार के छोटे आकार पर आधारित) अस्मिता (महिला सशक्तिकरण पर आधारित) प्रायश्चित (महिलाओं के शोषण पर आधारित), ज़िंदगी जीने के लिए है (रजो निवृत्ति पर आधारित) फ़िल्मों का निर्माण उन्होंने जन जागरूकता की दृष्टि से किया। ये फिल्में विभिन्न कार्यशालाओं और शिविरों में दिखाई गईं।

अंतिम समय तक वे महिला सशक्तिकरण महासंगठन की अध्यक्षा के रूप में स्त्री शिक्षा, किशोरी स्वास्थ्य, बाल स्वास्थ्य, कन्या भ्रूण हत्या जैसे मुद्दों पर काम करती रहीं। अस्वस्थता के चलते 14 अगस्त 2022 को इंदौर में उनका निधन हो गया ।

उपलब्धियां:   
• चिकित्सा के क्षेत्र में उल्लेखनीय अवदान हेतु  शिरोमणि  इंस्टीट्यूट द्वारा 1990-91 का महिला शिरोमणि पुरस्कार
• वर्ष 1996 में ‘नेत्रदान’ विषय पर लिखे लेख के लिए नेत्र सुरक्षा परिषद द्वारा प्रथम पुरस्कार
• बाल रोग विशेषज्ञ के रूप में उत्कृष्ट प्रदर्शन हेतु वर्ष 1999 में ग्लोबल सोसाइटी फॉर हेल्थ एंड एजुकेशनल ग्रोथ, नई दिल्ली द्वारा चिकित्सा सम्मान रत्न

पुरस्कार
• वर्ष 2001 में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन द्वारा डॉ. बी.सी. रॉय राष्ट्रीय पुरस्कार
• वर्ष 2002 में सत्कार कला केंद्र द्वारा पद्मभूषण डॉ. एस.के. मुखर्जी स्मृति पुरस्कार
• वर्ष 2002 में इंदिरा गांधी पुरस्कार समिति, इंदौर द्वारा प्रियदर्शिनी इंदिरा गांधी पुरस्कार
• वर्ष 2005 में माता गुजरी पुरस्कार
• वर्ष 2009 में महिला सशक्तिकरण महासंगठन द्वारा ‘वीमेन ऑफ़ दी इयर सम्मान’

इसके अलावा भी लायंस क्लब सहित अनेक संस्थाओं ने डॉ. सविता इनामदार को पुरस्कृत व सम्मानित किया है।

संदर्भ स्रोत: डॉ सविता इनामदार से सारिका ठाकुर की बातचीत पर आधारित 

© मीडियाटिक

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